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वट सावित्री व्रत : प्रेम, समर्पण और अटूट विश्वास का पावन पर्व

15 May 2026



-उदय कुमार सिंह


प्रेम की शक्ति कितनी अद्भुत हो सकती है, इसका सबसे प्रेरणादायक उदाहरण वट सावित्री व्रत में देखने को मिलता है। यह केवल एक धार्मिक व्रत नहीं, बल्कि पति-पत्नी के अटूट प्रेम, विश्वास और समर्पण का प्रतीक है। हिंदू धर्म में मान्यता है कि माता सावित्री ने अपने दृढ़ निश्चय, बुद्धिमत्ता और पतिव्रता धर्म के बल पर यमराज से अपने पति सत्यवान के प्राण वापस प्राप्त किए थे। यही कारण है कि आज भी विवाहित महिलाएं अपने पति की लंबी आयु, सुख-समृद्धि और अखंड सौभाग्य की कामना के लिए यह व्रत श्रद्धा के साथ रखती हैं।


वट सावित्री व्रत महिलाओं के लिए केवल पूजा-अर्चना का पर्व नहीं बल्कि रिश्तों की मजबूती, धैर्य, निष्ठा और समर्पण का संदेश देने वाला उत्सव भी है। यह व्रत हमें सिखाता है कि सच्चे प्रेम और अडिग विश्वास के सामने बड़ी से बड़ी बाधा भी टिक नहीं सकती।


क्या है वट सावित्री व्रत?वट सावित्री व्रत हिंदू धर्म का एक प्रमुख पर्व है, जिसे ज्येष्ठ मास की अमावस्या या पूर्णिमा तिथि को अलग-अलग क्षेत्रों में मनाया जाता है। उत्तर भारत में यह व्रत ज्येष्ठ अमावस्या को जबकि महाराष्ट्र, गुजरात और गोवा जैसे राज्यों में ज्येष्ठ पूर्णिमा को मनाने की परंपरा है। इस दिन विवाहित महिलाएं बरगद यानी वट वृक्ष की पूजा करती हैं और सावित्री-सत्यवान की कथा सुनती हैं। वट वृक्ष को दीर्घायु, स्थिरता और अमरत्व का प्रतीक माना गया है। धार्मिक मान्यता के अनुसार इसकी जड़ों में ब्रह्मा, तने में भगवान विष्णु और शाखाओं में भगवान शिव का वास होता है।


वट सावित्री व्रत का महत्ववट सावित्री व्रत का धार्मिक और सामाजिक दोनों दृष्टियों से विशेष महत्व है। यह व्रत पति की लंबी आयु, परिवार की सुख-समृद्धि और वैवाहिक जीवन में प्रेम बनाए रखने के लिए रखा जाता है। इस पर्व का संदेश है कि रिश्ते केवल शब्दों से नहीं बल्कि विश्वास, त्याग और समर्पण से मजबूत बनते हैं। सावित्री की कथा महिलाओं को साहस, धैर्य और निष्ठा की प्रेरणा देती है। यह पर्व परिवार और दांपत्य जीवन में प्रेम, सम्मान और एक-दूसरे के प्रति समर्पण की भावना को मजबूत करता है।


वट सावित्री व्रत कथाप्राचीन समय में मद्र देश के राजा अश्वपति की कोई संतान नहीं थी। संतान प्राप्ति के लिए उन्होंने वर्षों तक तपस्या और यज्ञ किया। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर देवी सावित्री प्रकट हुईं और उन्हें एक तेजस्वी पुत्री का वरदान दिया। देवी के आशीर्वाद से जन्म लेने के कारण कन्या का नाम सावित्री रखा गया।


समय बीतने के साथ सावित्री अत्यंत सुंदर, बुद्धिमान और गुणवान युवती बनीं। विवाह योग्य होने पर उनके पिता ने उन्हें स्वयं अपना वर चुनने की अनुमति दी। भ्रमण के दौरान सावित्री की मुलाकात वनवासी राजा द्युमत्सेन के पुत्र सत्यवान से हुई। सत्यवान सत्यवादी, धर्मात्मा और परोपकारी थे। सावित्री ने उन्हें अपना पति चुन लिया।


जब ऋषि नारद को यह पता चला तो उन्होंने राजा अश्वपति को बताया कि सत्यवान अल्पायु हैं और विवाह के एक वर्ष बाद उनकी मृत्यु निश्चित है। यह सुनकर राजा चिंतित हो उठे और उन्होंने सावित्री को अपना निर्णय बदलने के लिए कहा। लेकिन सावित्री अपने निर्णय पर अडिग रहीं। उन्होंने कहा कि आर्य कन्या जीवन में केवल एक बार ही पति का वरण करती है।


अंततः सावित्री और सत्यवान का विवाह हो गया। विवाह के बाद सावित्री अपने पति और अंधे सास-ससुर के साथ वन में रहने लगीं। वह पूरे समर्पण के साथ परिवार की सेवा करती थीं।


जैसे-जैसे सत्यवान की मृत्यु का समय निकट आने लगा, सावित्री ने कठोर उपवास और तपस्या आरंभ कर दी। नियत दिन सत्यवान लकड़ी काटने जंगल गए और सावित्री भी उनके साथ गईं। जंगल में अचानक सत्यवान के सिर में तेज दर्द हुआ और वे सावित्री की गोद में सिर रखकर लेट गए। तभी यमराज उनके प्राण लेने पहुंचे।


यमराज जब सत्यवान की आत्मा लेकर जाने लगे, तब सावित्री भी उनके पीछे चल पड़ीं। यमराज ने उन्हें कई बार लौटने के लिए कहा, लेकिन सावित्री अपने पति का साथ छोड़ने को तैयार नहीं हुईं।


सावित्री की निष्ठा और बुद्धिमत्ता से प्रसन्न होकर यमराज ने उन्हें वरदान मांगने को कहा। पहले वरदान में सावित्री ने अपने अंधे सास-ससुर की आंखों की रोशनी मांगी। दूसरे वरदान में उन्होंने अपने ससुर का खोया हुआ राज्य वापस मांगा। तीसरे वरदान में सावित्री ने सौ पुत्रों का वरदान मांग लिया।


यमराज ने तीनों वरदान दे दिए। तब सावित्री ने कहा कि पति के बिना संतान कैसे संभव है। यह सुनकर यमराज उनकी चतुराई और पतिव्रता धर्म से अत्यंत प्रभावित हुए और उन्होंने सत्यवान को पुनर्जीवन प्रदान कर दिया। इसके बाद सावित्री और सत्यवान सुखपूर्वक अपने परिवार के साथ रहने लगे। तभी से वट सावित्री व्रत की परंपरा शुरू हुई।


वट सावित्री व्रत तिथि और शुभ योगपंचांग के अनुसार, वर्ष 2026 में वट सावित्री व्रत उत्तर भारत में 16 मई 2026, शनिवार को मनाया जाएगा। अमावस्या तिथि 16 मई को प्रातः 05:11 बजे प्रारंभ होकर 17 मई 2026 को पूर्वाह्न 01:30 बजे तक रहेगी। उदया तिथि के अनुसार 16 मई को व्रत रखा जाएगा।


इस दिन प्रातः 10:26 बजे तक सौभाग्य योग रहेगा, जिसके बाद शोभन योग प्रारंभ होगा। ज्योतिष शास्त्र में ये दोनों योग अत्यंत शुभ माने जाते हैं। ऐसे में इन शुभ योगों में पूजा करना विशेष फलदायी माना गया है।


वट सावित्री व्रत पूजा विधि* प्रातः ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करें।* स्वच्छ या लाल-पीले वस्त्र धारण करें और सोलह श्रृंगार करें।* पूजा की थाली में रोली, अक्षत, फूल, धूप, दीप, फल, मिठाई और कच्चा सूत रखें।* वट वृक्ष के नीचे जाकर जल अर्पित करें।* रोली, चावल और पुष्प अर्पित कर वट वृक्ष का पूजन करें।* वट वृक्ष के चारों ओर कच्चा सूत लपेटते हुए 7, 11, 21 या 108 बार परिक्रमा करें।* सावित्री-सत्यवान की कथा सुनें या पढ़ें।* पति की लंबी आयु और परिवार की खुशहाली की कामना करें।* अंत में दान-पुण्य करें और बड़ों का आशीर्वाद लें।


वट सावित्री पूजन सामग्री* रोली, हल्दी और कुमकुम* अक्षत और पुष्प* धूप-दीप और घी* कच्चा सूत या कलावा* फल और मिठाई* नारियल, पान और सुपारी* जल से भरा कलश* सावित्री-सत्यवान की प्रतिमा या चित्र* सुहाग सामग्री जैसे चूड़ी, सिंदूर, बिंदी आदि


वट वृक्ष का धार्मिक महत्ववट वृक्ष को हिंदू धर्म में अमरता, स्थिरता और दीर्घायु का प्रतीक माना गया है। इसकी विशाल शाखाएं और लंबी आयु जीवन में मजबूती और स्थायित्व का संदेश देती हैं। मान्यता है कि वट वृक्ष की पूजा करने से त्रिदेवों का आशीर्वाद प्राप्त होता है और परिवार में सुख-शांति बनी रहती है।


वट सावित्री व्रत से मिलने वाली सीखवट सावित्री व्रत केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि प्रेम, धैर्य और अटूट विश्वास की प्रेरणादायक गाथा है। सावित्री की कहानी हमें यह सिखाती है कि सच्चे प्रेम और दृढ़ संकल्प के आगे मृत्यु जैसी अजेय शक्ति भी झुक सकती है। आज के समय में यह पर्व रिश्तों में विश्वास, सम्मान और समर्पण की अहमियत को याद दिलाता है। वट सावित्री व्रत हर दांपत्य जीवन को प्रेम, धैर्य और समझदारी के साथ निभाने की प्रेरणा देता है।

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