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नेपाल-तिब्बत जल प्रलय : मौत का आंकड़ा 584 पहुंचा, 2,482 लोग अब भी लापता

28 Aug 2026

  • दूसरी झील के खतरे से कुछ देर थमा राहत अभियान, भारत के लिए बढ़ी चिंता;
  • यूपी में मिले 10 शव, चीन ने ग्लेशियर टूटने को बताया तबाही की वजह

काठमांडू/रसुवा/नई दिल्ली, 28 अगस्त (इंद्रप्रस्थ न्यूज) । नेपाल-तिब्बत सीमा पर आई विनाशकारी बाढ़ और मलबे की त्रासदी तीसरे दिन शुक्रवार को और भयावह होती गई। राहत एवं बचाव अभियान पूरे दिन युद्धस्तर पर चलता रहा, लेकिन तिब्बत में बनी दूसरी अवरुद्ध झील (बैरियर लेक) के ओवरफ्लो होने के खतरे के कारण कुछ समय के लिए अभियान रोकना पड़ा। खतरा कम होने के बाद सेना और बचाव दलों ने फिर से अभियान शुरू किया, लेकिन पूरे क्षेत्र में हाई अलर्ट जारी है।

ताजा आधिकारिक जानकारी के अनुसार इस महाविपदा में नेपाल में 579 और तिब्बत में पांच लोगों सहित कुल 584 लोगों की मौत हो चुकी है। 2,482 लोग अब भी लापता हैं, जिनमें 260 विदेशी नागरिक शामिल हैं। नेपाल के 90 हजार से अधिक लोग इस आपदा से प्रभावित हुए हैं, जबकि हजारों लोग राहत शिविरों में रहने को विवश हैं।

शवों की पहचान सबसे बड़ी चुनौती

राहत दलों को लगातार मलबे और नदी किनारों से शव मिल रहे हैं, लेकिन तेज बहाव, कई किलोमीटर तक बह जाने और शवों के बुरी तरह क्षत-विक्षत होने के कारण उनकी पहचान बेहद कठिन हो गई है। सबसे बड़ी समस्या विदेशी पर्यटकों की है, क्योंकि अनेक लोगों के पासपोर्ट और पहचान पत्र बह गए हैं। नेपाल सरकार भारत सहित विभिन्न देशों के दूतावासों के सहयोग से डीएनए और अन्य माध्यमों से पहचान कराने में जुटी है।

भारत के लिए सबसे बड़ी चिंता

इस त्रासदी का सबसे अधिक असर विदेशी नागरिकों में भारतीयों पर पड़ा है। कैलाश-मानसरोवर यात्रा, गोसाईंकुंड और रसुवा क्षेत्र में फंसे भारतीयों की खोज अभी भी जारी है। नेपाल सेना ने हेलीकॉप्टरों के जरिए अनेक भारतीयों को सुरक्षित निकालकर काठमांडू पहुंचाया, जहां से तमिलनाडु सहित विभिन्न राज्यों के पर्यटकों को भारत भेजा गया। विदेश मंत्रालय लगातार नेपाल सरकार के संपर्क में है और भारतीय नागरिकों की पहचान तथा निकासी पर नजर रखे हुए है।

भारत तक पहुंची तबाही की मार

नेपाल से निकली बाढ़ का असर भारत तक दिखाई देने लगा है। तेज बहाव में बहकर आए 10 शव उत्तर प्रदेश के महाराजगंज और कुशीनगर जिलों में बरामद किए गए हैं। आशंका है कि ये शव नेपाल की बाढ़ के पीड़ितों के हैं। स्थानीय प्रशासन ने डीएनए और अन्य माध्यमों से उनकी पहचान कराने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। उत्तर प्रदेश और बिहार के सीमावर्ती जिलों में प्रशासन को सतर्क रहने के निर्देश दिए गए हैं तथा गंडक और उससे जुड़ी नदियों पर लगातार निगरानी रखी जा रही है।

दूसरी झील ने बढ़ाई दहशत

शुक्रवार को उस समय नया संकट पैदा हो गया, जब तिब्बत में भोटेकोशी के ऊपरी हिस्से में बनी दूसरी अवरुद्ध झील में पानी का स्तर तेजी से बढ़ने लगा। चीन की ओर से नेपाल को अलर्ट भेजे जाने के बाद राहत दलों को नदी किनारे से हटाया गया और लोगों को ऊंचे स्थानों पर पहुंचाया गया। बाद में खतरा कुछ कम होने पर अभियान दोबारा शुरू हुआ, लेकिन वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि झील में अभी भी लाखों घनमीटर पानी जमा है और लगातार निगरानी आवश्यक है।

चीन का दावा—ग्लेशियर टूटने से आई तबाही

बीजिंग में चीन के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता लिन जियान ने शुक्रवार को कहा कि प्रारंभिक वैज्ञानिक जांच से संकेत मिले हैं कि नेपाल-तिब्बत सीमा के ऊंचाई वाले क्षेत्र में विशाल ग्लेशियर टूटने के बाद अचानक पानी, बर्फ, चट्टानों और मलबे का सैलाब नीचे आया, जिसने इस भीषण आपदा को जन्म दिया। चीन ने हिमालयी ग्लेशियरों और संभावित खतरनाक झीलों की निगरानी और बढ़ाने की घोषणा की है।

नेपाल सेना के सामने दोहरी चुनौती

नेपाल सेना, सशस्त्र पुलिस बल और नेपाल पुलिस हेलीकॉप्टर, ड्रोन, खोजी कुत्तों और भारी मशीनों की मदद से राहत एवं बचाव अभियान चला रहे हैं। एक ओर मलबे में दबे लोगों की तलाश जारी है, दूसरी ओर हजारों विस्थापितों तक भोजन, दवाइयां और राहत सामग्री पहुंचाई जा रही है। सड़कें, पुल और संचार व्यवस्था ध्वस्त होने से कई गांव अब भी पूरी तरह कटे हुए हैं।

त्रासदी के प्रमुख आंकड़े

  • कुल मृतक: 584 (नेपाल 579, तिब्बत 5)
  • लापता: 2,482
  • विदेशी लापता: 260
  • प्रभावित आबादी: 90,000 से अधिक
  • भारत में बहकर मिले शव: उत्तर प्रदेश में 10
  • राहत कार्य: हजारों सुरक्षाकर्मी, हेलीकॉप्टर और भारी मशीनें अभियान में लगीं।

यह आपदा अब केवल नेपाल की त्रासदी नहीं रह गई है। सीमा पार भारत तक पहुंचे शव, बड़ी संख्या में लापता विदेशी नागरिक, कैलाश-मानसरोवर मार्ग पर फंसे श्रद्धालु और हिमालयी ग्लेशियरों से लगातार बढ़ते खतरे ने इसे पूरे दक्षिण एशिया के लिए एक गंभीर चेतावनी बना दिया है। विशेषज्ञों का मानना है कि हिमालय में जलवायु परिवर्तन के कारण बढ़ रहे ग्लेशियल जोखिमों से निपटने के लिए भारत, नेपाल और चीन के बीच वास्तविक समय की साझा चेतावनी प्रणाली विकसित करना अब समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है।

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