26 Sep 2026
जयपुर, 26 सितंबर (इंद्रप्रस्थ न्यूज)। राजस्थान हाईकोर्ट ने एक जमानत याचिका पर सुनवाई के दौरान माना है कि आपसी संबंध टूटना, बातचीत बंद कर फोन ब्लॉक करना या आरोपी का किसी अन्य महिला के साथ संबंध होना आत्महत्या के लिए उकसाने का अपराध नहीं माना जा सकता। इन परिस्थितियों को केवल भावात्मक आघात मान सकते हैं ना कि आत्महत्या के लिए उकसाना। हालांकि यह अलग बात है कि व्यक्तिगत संबंधों के स्तर पर आरोपी का ऐसा व्यवहार असंवेदनशील, दुखदायक या नैतिक रूप से निंदनीय माना जा सकता है, लेकिन यह मृतका को आत्महत्या के लिए कानूनी रूप से उकसाने के बराबर नहीं माना जा सकता। जस्टिस फरजंद अली ने यह आदेश आरोपित दिनेश मेहरा को जमानत देते हुए दिए।
अदालत ने कहा कि मृतका और आरोपी एक-दूसरे को अच्छी तरह जानते थे, उनके बीच लंबे समय तक संबंध रहे थे। घटना से पहले उनके बीच बातचीत बंद हो गई थी, आरोपी ने मृतका के फोन नंबर ब्लॉक कर दिए थे। मृतका इससे आहत थी कि आरोपी का जुड़ाव किसी अन्य महिला से है। अपनी मृत्यु से ठीक पहले बनाए वीडियो से भी मृतका की यही पीड़ा और आक्रोश झलकता है। अदालत ने मानवीय व्यवहार की जटिलता टिप्पणी करते हुए कहा कि रिश्तों में अलगाव, अस्वीकृति या ईष्या के प्रति हर व्यक्ति की प्रतिक्रिया अलग-अलग होती है। कानून हर उस परिस्थिति को दंडनीय अपराध नहीं बनाता जो किसी को गहरा भावनात्मक दुख या ठेस पहुंचाए। आपराधिक दायित्व के लिए विधिक तौर पर दोषपूर्ण आचरण का होना जरूरी है, न कि केवल नैतिक अस्वीकृति का। मामले से जुडे अधिवक्ता डॉ. विभूति भूषण शर्मा ने बताया कि आरोपी के खिलाफ पुलिस थाना सदर में आत्महत्या के लिए उकसाने के आरोप में मामला दर्ज हुआ था। निचली कोर्ट से जमानत नहीं मिलने पर मामला हाईकोर्ट पहुंचा।