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नूतन ऊर्जा और ऊष्मा का संचरण करती है \'वसंतपंचमी\'

22 Jan 2026



वसंतपंचमी (२३ जनवरी) पर विशेष


आचार्य पं. पृथ्वीनाथ पाण्डेय




वसंत ऋतु की मस्ती और उल्लास के क्षण में वसंतपंचमी का पर्व मनाया जाता है। यह पर्व मानव-हृदय मे नूतन ऊर्जा और ऊष्मा का संचरण करता है। सरस्वती की आराधना इस पर्व की विशेषता है। वस्तुत: सरस्वती 'कला' और 'साहित्य' की देवी हैं, जिनका भारतीय संस्कृति में शीर्ष स्थान है। हमारे पौराणिक ग्रन्थों में सरस्वती 'नागेश्वरी', 'भारती', 'शारदा', 'हंसवाहिनी', 'वीणावादिनी' इत्यादिक नामों से विश्रुत हैं तथा अत्यन्त विस्तारपूर्वक उनकी महिमा का वर्णन भी किया गया है। इसी आधार पर देश के विभिन्न भू-भागों में वसंतपंचमी के अलौकिक अवसर पर माँ शारदा का अर्चन-पूजन-स्तवन अतीव श्रद्धापूर्वक किया जाता है। वसंतपंचमी का पर्व भगवती सरस्वती को समर्पित रहता है।


अब आइए! 'वसंतपंचमी' का व्याकरणिक ज्ञान प्राप्त करें। वसंतपंचमी में दो शब्द हैं :– 'वसंत' और 'पंचमी'। हम पहले 'वसंत' शब्द को समझेँगे। यह 'वस्' धातु का शब्द है, जिसमे 'झच्' प्रत्यय जुड़ा हुआ है। इस प्रकार 'वसंत' शब्द का सर्जन होता है। हेमन्त और ग्रीष्म के मध्य की ऋतु 'वसंत' है। अब समझते हैं, 'पंचमी' को। पंचम शब्द मे 'ङीष्' प्रत्यय के जुड़ने से 'पंचमी' शब्द की रचना होती है। चान्द्रमास के प्रत्येक पक्ष की पाँचवीं तिथि 'पंचमी' कहलाती है। इस प्रकार 'वसंतपंचमी' का अर्थ हुआ- 'माघमास की शुक्लपंचमी'। इसे 'श्रीपंचमी' भी कहा गया है। यदि आप 'वसंतपंचमी' को अलग-अलग करके 'वसंत पंचमी' लिखते हैं तो आपका लेखन अशुद्ध माना जायेगा। आप इसे शुद्धतापूर्वक दो प्रकार से लिख सकते हैं :– (१) वसंतपंचमी (२) वसंत-पंचमी।'वसंतपंचमी' पर्व-आयोजन के मूल में एक मोहक कथा है। आप भी श्रवण करें :–


जब सृष्टि का आरम्भ होने का समय आ गया था तब भगवान् विष्णु ने ब्रह्मा को अपने पास बुलाया और उन्हें आदेश किया था- आप मनुष्य-योनि की रचना आरम्भ करें। ब्रह्मा ने भगवान् विष्णु का आदेश ग्रहण करने के पश्चात् मनुष्य-योनि की रचना की थी; परन्तु ब्रह्मा अपनी उस रचना से संतुष्ट नहीं थे। वे भगवान् विष्णु के पास पहुँचे और उनसे पुन: रचना करने के लिए अनुमति माँगी थी। विष्णु ने अपनी अनुमति दे दी थी। वे अपने लोक 'ब्रह्मलोक' लौट आये। अब वे सृष्टिरचना-प्रक्रिया से जुड़ गये। उन्होंने अपने कमण्डल से जल निकालकर उसे पृथ्वी पर छिड़क दिया था, जिसके कारण पृथ्वी में प्रतिक्रिया होने लगी, फलस्वरूप पृथ्वी पर कम्पन होने लगा तथा देखते-ही-देखते, एक अद्भुत शक्ति प्रकट हो गयी, जिसकी चार भुजाएँ थीं, जो सुदर्शना थी। उस चतुर्भुजी देवी के एक हाथ में वीणा और दूजा हाथ वर देने की मुद्रा में था। उनके अन्य दो हाथों में पुस्तक और माला थी। उस चतुर्भुजी देवी ने अपने प्रकट होते ही वीणा का सुमधुर झंकार किया था, जिससे संसार के समस्त जीवधारियों को वाणी प्राप्त हो गयी थी। उस प्रभाव का अनुभव करते ही, ब्रह्मा ने उस देवी का 'वाक्देवी''वाग्देवी''वाणी की देवी सरस्वती' का नामकरण किया था।माँ सरस्वती की सर्वप्रथम आराधना करके 'सरस्वती-पूजन' का समारम्भ श्री कृष्ण ने किया था। इसके लिए सिर पर मुकुट, गले में वैजयन्तीमाला, हाथों में मुरली धारण करते हुए, उन्होंने सर्वप्रथम देवी सरस्वती की अभ्यर्थना की थी।


'ब्रह्मवैवर्तपुराण' के 'प्रकृति- खण्ड' में कहा गया है कि श्री कृष्ण द्वारा पूजित होने पर माँ सरस्वती समस्त लोक मे सबके द्वारा पूजी जायेंगी। इसी अवसर पर श्री कृष्ण ने सरस्वती को यह वर दिया था– हे सरस्वती! अब तुम्हारी पूजा सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में प्रत्येक माघमास की शुक्लपंचमी की तिथि से समारम्भ हो जायेगी, जो यही विद्यारम्भ की तिथि भी कहलायेगी।


वास्तव में, सरस्वती जलदेवी हैं। सरस्वती नदी के नाम पर ही उनका उल्लेख किया जाता है। उनका जल हिमालय से निर्गत होता है, जो दक्षिण-पूर्व प्रवहमानता के साथ तीर्थराज प्रयाग-स्थित गंगा-यमुना के साथ संगम कर, 'त्रिवेणी' के नाम से अभिहित होने लगता है। सरस्वती को 'वाग्देवी' और 'ज्ञानदेवी' की संज्ञा से भी विभूषित किया गया है। उल्लेखनीय है कि प्राचीनकाल में इसी सारस्वत अवसर पर गुरुकुलों और आश्रमों के स्नातकों के 'दीक्षान्त-समारोह' आयोजित किये जाते थे।


वसंत को 'ऋतुराज' भी कहा जाता है। यों तो सिद्धान्तत: वसंत ऋतु तीन महीने की होती है; तापमान सामान्य रहता है; न तो अधिक शीत की ठिठुरन और न ही अधिक ग्रीष्म की तपन।


फाल्गुन ('फागुन' का तत्सम शब्द)-मास है; शिशिर ऋतु का अन्त हो रहा है। वह शीत, जिसने क्या मनुष्य, पशु, पक्षी, पौधे-पेड़; अर्थात् समस्त जड़-चेतनजगत् मे अपने तीक्ष्ण प्रहारों से 'ठिठुरन' ला दी थी, अब वही आतंकी शीत अन्तिम श्वास ले रहा है। हवा में गरमाहट आ गयी है। वसंत का आगमन हो रहा है। उसके स्वागत और अभिनन्दन के लिए लताओं और वृक्षों ने नूतन परिधान धारण कर लिये हैं। सरसों वासंती साड़ी पहन इतरा रही है; इठला रही है तथा वसुधा पर सर्वत्र बिछी हरीतिमा पर अठखेलियाँ खेल रही है। ऐसा प्रतीत होता है, मानो क्षितिज वसुन्धरा के साथ संवाद करने और अभिरम्भ (भींचकर गले लगाने के लिए उद्यत) करने के लिए मचल हो उठा हो; नभ में विहगवृन्द उन्मुक्त भाव के साथ अपने वक्षप्रान्त को लहरा-लहराकर यों उड़ान भर रहे हैं, मानो अवनि और अम्बर-तल में स्वच्छ चाँदनी सम्पूर्ण आभा और प्रभा के साथ अपनी समुपस्थिति अंकित करा रही हो; पक्षियोँ का कलरव यों प्रतीत होता है, मानो उनका वृन्द (समूह) समवेत स्वर मे 'स्वागत-गान कर रहा हो; भौंरे विरुदावली गुनगुना रहे हैं; बौर की सम्पन्नता से आम की डालियाँ विनम्रतापूर्वक नतमस्तक हो रही हैं; वहीं पुष्पवाटिका मे रंग-विरंगे पुष्पों से सुशोभित पौधे यत्र-तत्र-सर्वत्र अपना सौरभ बिखेर रहे हैं। मन-प्राण को सम्मोहित करनेवाले ऐसे प्रफुल्ल वातावरण मे कुसुमाकर 'वसंत' का पादप्रक्षेप (पदार्पण) होता है।वसंतऋतु में प्रकृति अपना नव शृंगार करती है। रंग-विरंगे पुष्पोँ से अलंकृत उसका कोमल शरीर दर्शकगण को मन्त्रमुग्ध कर लेता है। ऐसे वातावरण की सृष्टि होती है, मानो प्रकृति 'नव वधू'-सी प्रतीत हो रही हो, जिससे प्रेरित होकर ही कोकिल कूजती है; भ्रमर गुनगुनाते हैं; अन्य पक्षी कलरव कर, उसका यशोगान करते हैं तथा मानव रागरंग और और वसंत की मादक गन्ध से मस्त हो जाते हैं। मस्ती के ऐसे ही क्षण मे 'फाग' का स्वर स्वत: फूट पड़ता है।


सृष्टि-सौन्दर्य की झाँकी वनो, उपवनो, पर्वतीय क्षेत्रों तथा ग्राम्यांचलों में ही देखने को मिलती है, जहाँ प्रकृति एवं निसर्ग के मनोहारी रूप के दर्शन होते हैं।


सुबह-शाम खेतों की ओर निकल आइए, आपको सरसों के पीले-पीले फूल, हवा मे लहराती जौ-गेहूँ की बालियाँ, छीमियाँछेमियाँ तथा श्वेत-नीले फूलोँ से लदे और धरती पर फैले हुए पौधे आपका मन मोह लेँगे और आम्र-मंजरियाँ अपनी सुगन्ध से आपको सम्मोहित कर लेंगी। नगरों में ऐसे मोहक परिदृश्य से नगरवासी वंचित रहते हैं। वसंत की बहार का वास्तविक आनन्द तो पर्वतीय और ग्रामीणजन ही ले पाते हैं।


वसंत के आगमन का प्रभाव प्रकृति पर ही नहीं, मानव के स्वास्थ्य पर भी पड़ता है। वसंतऋतु में प्रात: उन्मुक्त और स्वच्छ हवा मे टहलना, स्वास्थ्य के लिए लाभप्रद होता है। इससे पाचनशक्ति मे वृद्धि होती है और शरीर नीरोग रहता है। चूँकि वसंतऋतु मे वायु विशुद्ध और सुगन्ध से सराबोर रहती है इसलिए उसमे श्वास लेने से फेफड़ों मे किसी प्रकार के रोग होने की सम्भावना जाती रहती है। चारों ओर हर्ष और उल्लास का वातावरण होने से मन उत्साह से भरा रहता है; आलस्य पास फटकने नहीं पाता। इस प्रकार वसंतऋतु का आगमन मानव के लिए एक ईश्वरीय वरदान की भाँति है।जो लोग 'वसंतऋतु की उपयोगिता और महत्ता को मात्र हिन्दू-सम्प्रदाय में देखते-पाते हैं, उन्हें अपना दृष्टि-विस्तार करना होगा। सूफ़ी-सम्प्रदाय के धर्माचार्योँ ने भारत के मुसलमानों के मध्य वसंतऋतु की महिमा का मण्डन किया है। मुग़ल-काल से ही सूफ़ीजन के बहुचर्चित देव-उपासनास्थलों में वसंतपर्व की महत्ता को रेखांकित किया गया है, जिसका बोध करने के लिए 'निज़ाम औलिया का वसंत', 'ख़्वाजा बख़्तियार काकी का वसंत', 'खुसरो का वसन्त' इत्यादिक का अनुशीलन किया जा सकता है। अमीर खुसरो और निज़ामुद्दीन औलिया गीत-संगीत के साथ वसंतऋतु के प्रति आस्थावान् थे। सूफ़ी कवि खुसरो स्वरचित गीत-गायन करते थे :–


"आज वसंत मना ले सुहागन, आज वसंत मना ले। अंजन-मंजन कर पिया मोरी, लम्बे नेहर लगा ले।"


बांग्लादेश मे बंगाली कैलेण्डर के अनुसार, वसंतऋतु (बोशोन्तो उत्सोब) के प्रथम दिन बंगाली मास फाल्गुन का आयोजन किया जाता है और पश्चिम बंगाल में पारिवारिक उत्सव, मेला इत्यादिक आयोजित किया जाता है। पाकिस्तान मे वसंत पर्व सीमित रूप में मनाया जाता है। वहाँ का जनमानस इसी पर्व को 'जश्ने बहाराँ' के नाम से लगभग एक माह तक मनाता है। लाहौर और पंजाब में वसंत का उत्साह देखते ही बनता है। लाहौर में 'वसंत-मेला' का आयोजन धूमधाम के साथ किया जाता है। वहाँ के भारतीय कालूराम ने अट्ठारहवीँ शताब्दी के उस भारतीय बलिदानी की पुण्य स्मृति में वसंतपर्व का आयोजन समारम्भ किया था, जिसने इस्लाम धर्म स्वीकार करने से अस्वीकार कर दिया था। राष्ट्रीयता से ओत-प्रोत उस वीर सुपूत का नाम 'हक़ीक़त राय' था। महाराजा रणजीत सिंह लाहौर में इसी अवसर पर कई उत्सव आयोजित करते थे; पतंगबाज़ी भी होती थी। पंजाबत प्रान्त में भी 'वसंतपंचमी' का हर्षोल्लास के साथ आयोजन किया जाता था। होलिकोत्सव का आरम्भ भी इसी अवसर पर होता है। भारतीय गाँवों मे सांस्कृतिक वातावरण का सर्जन होने लगता है; ढोलक पर थाप पड़ने लगती है। सम्पूर्ण वातावरण हर्ष और उल्लास से भर जाता हऋतुराज वसंत वस्तुत: धरती पर भगवान् का प्रतिनिधि बनकर आता है। उसके साम्राज्य मे छोटे-बड़े, निर्धन-धनी प्रफुल्ल रहते हैं। वह जन-जन में नव कृति की उमंग भरता है। वह ऐसा उदार और कृपालु राजा है, जो जन-कल्याण के लिए अपनी सम्पूर्ण सम्पदा और विभूति जन-जन पर न्योछावर कर देता है। वह प्रतिवर्ष हमसे कुछ लेने के लिए नहीँ, अपितु देने के लिए ही आता है। ऐसे पर्व की जय हो, जो जड़-चेतन को अपने आगमन से प्रमुदित करता रहता है।


(लेखक, व्याकरणवेत्ता एवं भाषाविज्ञानी हैं।)















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