30 Sep 2026
प्रयागराज, 30 सितम्बर (एजेंसी)। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने कहा है कि नाबालिग बच्चे के भरण-पोषण की जिम्मेदारी केवल पिता पर नहीं डाली जा सकती। सामान्यतः माता-पिता दोनों को अपनी-अपनी आय और आर्थिक क्षमता के अनुसार बच्चे के पालन-पोषण और अन्य खर्चों में योगदान करना होता है। जस्टिस लक्ष्मी कांत शुक्ला की पीठ ने यह टिप्पणी एक महिला और उसके दो नाबालिग बच्चों द्वारा दाखिल आपराधिक पुनरीक्षण याचिका खारिज करते हुए की। याचिका में परिवार न्यायालय के उस आदेश को चुनौती दी गई थी, जिसमें दोनों बच्चों के लिए 1,500 - 1,500 प्रतिमाह भरण-पोषण देने का निर्देश पिता को दिया गया था।
उच्च न्यायालय ने धारा 125 दंड प्रक्रिया संहिता की योजना पर विचार करते हुए कहा कि इसके तहत नाबालिग बच्चे के भरण-पोषण का दावा उसके “पिता या माता” से किया जा सकता है। इसलिए इस वैधानिक जिम्मेदारी को केवल पिता की जिम्मेदारी नहीं माना जा सकता। न्यायालय ने कहा: “नाबालिग बच्चे के भरण-पोषण की जिम्मेदारी केवल पिता या मां में से किसी एक पर नहीं डाली जा सकती। सामान्यतः दोनों माता-पिता को अपनी-अपनी आर्थिक क्षमता के अनुसार बच्चे के भरण-पोषण और पालन-पोषण में योगदान करना होगा।”
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि धारा 125 के तहत भरण-पोषण तय करते समय दोनों माता-पिता की आर्थिक स्थिति और भुगतान करने की क्षमता को ध्यान में रखना जरूरी है। अधिक आय होने पर मां जिम्मेदारी से पूरी तरह पीछे नहीं हट सकती। मामले में हाईकोर्ट ने पाया कि महिला ने खुद अपने और बच्चों के खर्चों के संबंध में कुछ बयान दिए थे। रिकॉर्ड में यह भी सामने आया कि वह कोचिंग के जरिए आय अर्जित कर रही थी। पति का पक्ष था कि उसकी आय पत्नी से कम है। पति जूनियर हाईस्कूल में इंस्ट्रक्टर के रूप में कार्यरत था और उसकी आय करीब 9,000 प्रतिमाह बताई गई थी।
उच्च न्यायालय ने परिस्थितियों को देखते हुए कहा कि यदि मां की आय पिता से अधिक है, तो वह बच्चों के भरण-पोषण और अन्य खर्चों में योगदान करने की अपनी जिम्मेदारी से पूरी तरह इनकार नहीं कर सकती। कोर्ट ने कहा: “बच्चों के पालन-पोषण और भरण-पोषण की जिम्मेदारी सामान्यतः दोनों माता-पिता द्वारा उनकी आर्थिक क्षमता के अनुसार साझा की जानी चाहिए और इसे केवल किसी एक पर नहीं डाला जा सकता।”
यह मामला जौनपुर के प्रधान न्यायाधीश, परिवार न्यायालय के आदेश के खिलाफ दाखिल किया गया था। परिवार न्यायालय ने दोनों नाबालिग बच्चों के लिए 1,500-1,500 प्रतिमाह भरण-पोषण देने का आदेश दिया था, जबकि पत्नी के लिए भरण-पोषण देने की मांग को खारिज कर दिया था। महिला अर्चना राव ने हाईकोर्ट में दावा किया कि उसकी कोई स्वतंत्र आय नहीं है और वह अपने पिता के साथ बच्चों के साथ रह रही है। उसने यह भी कहा कि बच्चों के लिए तय राशि उनकी बुनियादी जरूरतों को पूरा करने के लिए पर्याप्त नहीं है। वहीं, पति ने पत्नी के अपने बयान और उसके कोचिंग कार्य से संबंधित जानकारी का हवाला देते हुए याचिका का विरोध किया। हाईकोर्ट ने पुनरीक्षण याचिका खारिज की और कहा कि बच्चों के साथ कौन सा अभिभावक रह रहा है, यह तथ्य अपने आप में यह तय नहीं करता कि बच्चों की पूरी आर्थिक जिम्मेदारी उसी अभिभावक या दूसरे अभिभावक पर डाल दी जाए। कोर्ट ने सामाजिक एवं आर्थिक परिस्थितियों तथा दोनों माता-पिता की वित्तीय क्षमता को ध्यान में रखना जरूरी बताया। इन परिस्थितियों में हाईकोर्ट को परिवार न्यायालय के आदेश में हस्तक्षेप का कोई आधार नहीं मिला और पत्नी की आपराधिक पुनरीक्षण याचिका खारिज कर दी।