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औरैया में 12 अगस्त 1942 को छात्रों ने अंग्रेजों को दी थी खुली चुनौती,तिरंगा फहराने पर बरसी थीं गोलियां

12 Aug 2026



  • अंग्रेजी सरकार की गोलीबारी में छह क्रांतिवीर हुए थे बलिदान, चंबल के बीहड़ों में भी ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ गूंजा था विद्रोह


औरैया, 12 अगस्त (एजेंसी)। उत्तर प्रदेश के औरैया जनपद में 12 अगस्त 1942 की तारीख इतिहास में दर्ज वह दिन है, जब शहर की सड़कों पर पढ़ने वाले छात्रों के कदम अंग्रेजी हुकूमत को चुनौती देने के लिए आगे बढ़े थे। हाथों में किताबों की जगह तिरंगा था और दिल में आजादी का जुनून। अंग्रेजी शासन के प्रतीक यूनियन जैक को सदर तहसील भवन से उतारकर तिरंगा फहराने का संकल्प लेकर निकले छात्रों के सामने ब्रिटिश पुलिस की बंदूकें भी उनके हौसले को नहीं डिगा सकीं थी। गोलियां चलीं, कई छात्र घायल हुए और छह क्रांतिवीरों ने भारत माता की जय बोलते हुए अपने प्राणों का बलिदान दे दिया था।


यह वह दौर था, जब देश के बड़े नेताओं को अंग्रेजी हुकूमत जेलों में डाल चुकी थी। आंदोलन की कमान अब युवाओं और छात्रों के हाथों में पहुंच चुकी थी। अगस्त 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन की चिंगारी पूरे देश में धधक रही थी। बलिया, पटना और जबलपुर जैसे शहरों के साथ औरैया भी इस आंदोलन की आग में तप रहा था।


बस्तों में बंद हुईं किताबें, हाथों में आ गया तिरंगा


गुलामी से मुक्ति का जुनून औरैया के छात्रों के सिर चढ़कर बोल रहा था। तिलक इंटर कॉलेज, जिसे उस समय एबी हाईस्कूल के नाम से जाना जाता था, आंदोलन की गतिविधियों का प्रमुख केंद्र बन गया था। पढ़ाई के बाद परिसर में पेड़ों की छांव के नीचे बैठकर छात्र अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ रणनीति तैयार करते थे।


कहा जाता है कि महात्मा गांधी भी इस परिसर में आए थे और यहां की मिट्टी का तिलक अपने माथे पर लगाया था। उनके द्वारा रोपा गया पौधा आगे चलकर वृक्ष बना और स्वतंत्रता आंदोलन की स्मृतियों का साक्षी बना।


12 अगस्त को छात्रों का हुजूम तहसील भवन की ओर बढ़ा


छात्रों का मकसद साफ था गुलामी के प्रतीक यूनियन जैक को उतारकर उसकी जगह तिरंगा फहराना। छात्र सदर तहसील भवन पर चढ़ गए। यूनियन जैक उतारा गया और उसकी जगह तिरंगा फहरा दिया गया। इससे अंग्रेजी पुलिस बौखला उठी। छात्रों को रोकने की कोशिश हुई, लेकिन वे पीछे हटने को तैयार नहीं थे।


20 राउंड चली गोलियां और छह बलिदान


ब्रिटिश पुलिस ने छात्रों पर गोलियां चला दीं। करीब 20 राउंड हुई फायरिंग में छह छात्र बलिदान हो गए। दर्जनों छात्र घायल होकर जमीन पर गिर पड़े, लेकिन उनके मुंह से भारत माता की जय और इंकलाब जिंदाबाद के नारे निकलते रहे।


औरैया के इस साहस की गूंज जेलों तक पहुंची। उस समय जेलों में बंद भारतीय नेताओं ने जब छात्रों के संघर्ष और उनकी हुंकार के बारे में सुना तो उनके भीतर भी जोश भर उठा। लंबे समय से क्रांतिकारी पर काम कर रहे पूर्व सैनिक अविनाश अग्निहोत्री बताते हैं कि 12 अगस्त 1942 का यह घटनाक्रम औरैया के स्वतंत्रता आंदोलन के सबसे महत्वपूर्ण अध्यायों में शामिल हो गया।


घायल क्रांतिकारी विजय शंकर गुप्ता थे प्रत्यक्षदर्शी


इस गोलीकांड में गंभीर रूप से घायल हुए एबी स्कूल के क्रांतिकारी छात्र दिवंगत विजय शंकर गुप्ता थे। इस ऐतिहासिक घटना के बारे वे लोगों को बताते थे कि 12 अगस्त 1942 की घटना सुनाते थे तो उनकी आवाज में वही जोश दिखाई देता था। उनकी आंखों के सामने वह मंजर जीवंत हो जाता था, तहसील भवन, हाथों में तिरंगा लिए छात्र, अंग्रेजी पुलिस की बंदूकें और आजादी के लिए कुर्बान होते साथी।


चंबल के बीहड़ों में भी अंग्रेजों के खिलाफ गुरिल्ला जंग


आजादी की इस लड़ाई में औरैया और आसपास के चंबल क्षेत्र की भूमिका भी कम रोचक नहीं रही। जिस चंबल के बीहड़ का नाम सुनकर आज भी लोगों के जेहन में डाकुओं की तस्वीर उभरती है, उसी बीहड़ में अंग्रेजी शासन के खिलाफ बागियों ने भी मोर्चा संभाला था।


अंग्रेजी पुलिस जब आंदोलन को दबाने के लिए गांवों और शहरों की ओर बढ़ती थी, तो बीहड़ों में छिपे बागी उन्हें रोकने और खदेड़ने की कोशिश करते थे। शहर में छात्र जहां अंग्रेजों से सीधा मुकाबला कर रहे थे, वहीं यमुना और चंबल के किनारे बीहड़ों में गुरिल्ला संघर्ष चल रहा था।


ब्रह्मचारी डकैत का नाम भी इस संघर्ष से जुड़े इतिहास में मिलता है


उस दौर में महात्मा गांधी और अन्य नेताओं के आजादी के नारों ने बीहड़ों में रहने वाले इन बागियों के भीतर भी देशभक्ति की भावना जगाई थी। इन बागियों में ब्रह्मचारी डकैत का नाम भी सामने आता है। बताया जाता है कि ब्रह्मचारी डकैती में उसे दौर में अंग्रेजी सैनिकों पर बीहड़ पहुंचने पर मोर्चा संभाला था।

मुकुंदीलाल ने 1925 में जगा दिया था क्रांति का जज्बा


औरैया की क्रांतिकारी परंपरा 1942 से नहीं शुरू हुई थी। बल्कि इससे करीब 17 वर्ष पहले 9 अगस्त 1925 को भारतवीर मुकुंदीलाल ने अपने साथियों के साथ काकोरी कांड में अंग्रेजी सरकार के खजाने को ले जा रही ट्रेन को निशाना बनाकर ब्रिटिश हुकूमत को चुनौती दी थी। काकोरी कांड के इस क्रांतिकारी ने औरैया के युवाओं के भीतर जोश और देशभक्ति की जो लौ जलाई, वह आगे चलकर स्वतंत्रता आंदोलन में और तेज होती गई।


बलिदानी विरासत को बचाना जरूरी


आजादी के इन अमर सपूतों ने अपने निजी हितों, सुख-सुविधाओं और जीवन तक को देश के नाम कर दिया। उनकी याद में स्मारक और प्रतिमाएं तो स्थापित की गईं, लेकिन असली श्रद्धांजलि तभी होगी जब नई पीढ़ी उनके संघर्ष और बलिदान को जानेगी।


औरैया की धरती के उन छह बलिदान छात्रों की कहानी केवल इतिहास की किताबों का हिस्सा नहीं है। यह उस साहस की कहानी है, जब निहत्थे छात्रों ने अंग्रेजी साम्राज्य की बंदूकों के सामने तिरंगा उठाया था।


12 अगस्त 1942 की वह तारीख आज भी औरैया से सवाल करती है, क्या हम उन बलिदानियों की कुर्बानी को उतनी ही शिद्दत से याद करते हैं, जितनी शिद्दत से उन्होंने देश की आजादी के लिए अपना जीवन न्योछावर किया था।


पूर्व सैनिक और क्रांतिकारियों के वीर शौर्य पर काम करने वाले अविनाश अग्निहोत्री ने बताया कि आज औरैया के वीर बलिदानियों की याद कर कई कार्यक्रम किए जा रहे हैं, उनमें प्रमुख रूप से उन आजादी की लड़ाई में बलिदान हुए जिले के उन छात्रों को जरूर याद किया जाएगा। वहीं विचित्र पहल संस्था भी बलिदानियों को याद कर कार्यक्रम करेगी।