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नेपाल त्रासदीः जब अपनों की पहचान लौट आए, तब सहायता का अर्थ और बड़ा हो जाता है

04 Sep 2026

  • डॉ. मयंक चतुर्वेदी



प्राकृतिक आपदा मनुष्य से बहुत कुछ छीन लेती है। घर, आजीविका, संपत्ति और कई बार जीवन भी समाप्त कर देती है। आपदा का सबसे पीड़ादायक अध्याय उस समय शुरू होता है, जब किसी परिवार को यह पता ही न हो कि उसका अपना व्यक्ति जीवित है या उन अज्ञात शवों में शामिल है, जिनकी पहचान संभव नहीं हो पा रही।


वस्तुत: नेपाल की विनाशकारी बाढ़ के बीच भारत ने इसी मानवीय पीड़ा को समझते हुए जो पहल की है, वह सामान्य आपदा राहत से कहीं आगे जाती है। भारत ने नेपाल में लापता लोगों के शवों की पहचान के लिए अपनी अत्याधुनिक फोरेंसिक डीएनए प्रोफाइलिंग सुविधाएं उपलब्ध कराने का निर्णय लिया है। निश्चित ही यह पहल बताती है कि मानवीय सहायता यहां इस अर्थ में महत्वपूर्ण है, जब किसी अपने के साथ घटी दुर्घना के बाद भी उसके परिवार को सत्य, पहचान और अंतिम शांति उपलब्ध होती है।


भारत सरकार के गृह मंत्रालय ने नेपाल में जारी पहचान प्रक्रिया में सहयोग के लिए देश की फोरेंसिक सुविधाओं का उपयोग करने की अनुमति दी है। भारत में मौजूद लापता व्यक्तियों के प्रथम श्रेणी के जैविक संबंधी, माता-पिता, बच्चे अथवा भाई-बहन निर्धारित फोरेंसिक प्रयोगशालाओं में अपने जैविक नमूने देकर डीएनए प्रोफाइल तैयार करा सकेंगे। इन प्रोफाइल का नेपाल में मिले अज्ञात शवों से प्राप्त डीएनए नमूनों के साथ वैज्ञानिक मिलान किया जा सकेगा।यह व्यवस्था तकनीक के मानवीय उपयोग का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। क्योंकि आपदा के बाद कई शव लंबे समय तक पानी, मलबे और प्राकृतिक परिस्थितियों के संपर्क में रहते हैं। चेहरे की पहचान संभव नहीं रहती, दस्तावेज नष्ट हो जाते हैं और पारंपरिक पहचान के साधन निष्प्रभावी हो जाते हैं। ऐसी स्थिति में डीएनए प्रोफाइलिंग परिवार और अज्ञात शव के बीच वह वैज्ञानिक कड़ी बनती है, जो अंतिम सत्य तक पहुंचा सकती है।


कल्पना कीजिए उस परिवार की, जो कई दिनों से अपने बेटे, बेटी, माता, पिता, भाई या बहन की प्रतीक्षा कर रहा है। फोन बंद है, कोई सूचना नहीं है और हर अज्ञात शव के साथ उम्मीद और भय दोनों जुड़ जाते हैं। ऐसी स्थिति में ‘पता नहीं’ से बड़ा मानसिक यातना का कोई दूसरा शब्द नहीं होता, तब डीएनए विज्ञान उस अंतहीन अनिश्चितता को समाप्त करने का माध्यम बनता है, इसलिए भारत की यह पहल परिवारों को उनके अपनों के बारे में निश्चित जानकारी लौटाने का प्रयास है। किसी व्यक्ति की मृत्यु के बाद उसके अस्तित्व का अंतिम प्रमाण उसके परिवार तक पहुंचाना भी मानवीय दायित्व है।


नेपाल के संदर्भ में भारत की भूमिका की विशेषता यह भी है कि संकट के समय सहायता का यह सिलसिला नया नहीं है। दोनों देशों के बीच गहरे सामाजिक, सांस्कृतिक और मानवीय संबंध हैं। इसलिए भारत के लिए नेपाल की आपदा किसी दूर देश की त्रासदी नहीं, बल्कि एक ऐसे पड़ोसी की पीड़ा है, जिसके साथ उसके संबंध सदियों पुराने हैं। नवंबर 2023 में नेपाल में आए भूकंप के बाद भारत ने तत्काल राहत सामग्री उपलब्ध कराई। सितंबर 2024 में भारी बारिश, बाढ़ और भूस्खलन के बाद भी भारत ने नेपाल सरकार के अनुरोध पर राहत सामग्री भेजी और बाधित संपर्क बहाल करने के लिए बेली ब्रिज उपलब्ध कराए। 2015 के विनाशकारी भूकंप के बाद भारत का ‘ऑपरेशन मैत्री’ भी इसी पड़ोसी धर्म का बड़ा उदाहरण था।


इस निरंतरता को भारत की ‘Neighbourhood First’ नीति के व्यापक संदर्भ में देखा जाना चाहिए। भारत की विदेश नीति में पड़ोसी देशों की स्थिरता और समृद्धि को अपनी समृद्धि से जोड़कर देखने की दृष्टि है। आपदा के समय यह दृष्टि कूटनीतिक वक्तव्यों से निकलकर जमीन पर दिखाई देती है। तुर्किये और सीरिया में भूकंप के बाद ‘ऑपरेशन दोस्त’ के माध्यम से खोज एवं बचाव दल, प्रशिक्षित डॉग स्क्वॉड, विशेष उपकरण और फील्ड अस्पताल भेजे गए। म्यांमार में चक्रवात मोचा के बाद ‘ऑपरेशन करुणा’ के तहत सहायता पहुंचाई गई। टाइफून यागी के बाद दक्षिण-पूर्व एशिया के देशों में ‘ऑपरेशन सद्भाव’ के माध्यम से राहत सामग्री पहुंचाई गई।


युद्ध और संकट के बीच नागरिकों की सुरक्षित निकासी में भी भारत ने अपनी क्षमता दिखाई है। यूक्रेन से ‘ऑपरेशन गंगा’, अफगानिस्तान से ‘ऑपरेशन देवी शक्ति’ और सूडान से ‘ऑपरेशन कावेरी’ इसके उदाहरण हैं। इन अभियानों में भारतीय नागरिकों के साथ कई विदेशी नागरिकों को भी सुरक्षित निकाला गया।


कहना होगा कि यह पूरी यात्रा एक महत्वपूर्ण परिवर्तन को रेखांकित करती है, जिसमें भारत किसी भी आपदा के समय खोज एवं बचाव, चिकित्सा, पुनर्वास, निकासी, बुनियादी ढांचे की बहाली और अब फोरेंसिक पहचान जैसे क्षेत्रों में भी अपनी क्षमताएं राहत के तौर पर अन्य देशों से साझा कर रहा है। इस दृष्टि से भारत का संदेश यहां स्पष्ट है, मानवता की कोई सीमा रेखा नहीं होती। विज्ञान तब सबसे सार्थक होता है, जब वह किसी प्रयोगशाला से निकलकर किसी परिवार की पीड़ा कम करे।


बेशक, डीएनए की एक रिपोर्ट किसी के लिए महज वैज्ञानिक दस्तावेज हो सकती है, किंतु किसी मां के लिए वह उसके बेटे की अंतिम पहचान है। किसी बच्चे के लिए उसके पिता की अंतिम पुष्टि और किसी भाई या बहन के लिए वर्षों तक चलने वाली अनिश्चितता का अंत।


ऐसे में कहना यही है, दुनिया जब आपदाओं, जलवायु परिवर्तन और प्राकृतिक संकटों की बढ़ती चुनौती से जूझ रही है, तब भारत का यह मॉडल महत्वपूर्ण संदेश देता है कि किसी देश की शक्ति सिर्फ उसकी आर्थिक या सैन्य क्षमता से नहीं मापी जानी चाहिए। संकट की घड़ी में वह कितनी तेजी से दूसरे के लिए खड़ा होता है, कितनी विशेषज्ञता साझा करता है और कितनी संवेदना के साथ पीड़ितों का हाथ थामता है, यह भी उसकी शक्ति का पैमाना है। आज नेपाल में डीएनए प्रोफाइलिंग के लिए भारत की प्रयोगशालाओं के द्वार खोलना इसी शक्ति का मानवीय चेहरा है। यहां सहायता का लक्ष्य यह है कि किसी परिवार को अपने प्रियजन के बारे में हमेशा के लिए अंधेरे में न रहना पड़े।


(लेखक, हिन्दुस्थान समाचार से संबद्ध हैं।)