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अंतरिम भरण-पोषण : पत्नी, पति से अपनी पढ़ाई के खर्च का भी कर सकती है दावा : हाईकोर्ट

20 Jan 2026


--फैमिली कोर्ट के आदेश को सही मान हाईकोर्ट ने पति की याचिका की खारिज


प्रयागराज, 20 जनवरी (हि.स.)। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने पत्नी के पक्ष में अंतरिम भरण-पोषण के आदेश को बरकरार रखते हुए कहा कि पत्नी द्वारा अपनी शिक्षा से सम्बंधित खर्चों के लिए अंतरिम भरण-पोषण का दावा करना प्रथमदृष्टया उचित है। हाइकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि अब यह स्थापित कानून है कि यदि पति को पर्याप्त अवसर दिए जाने के बावजूद वह अपनी आय और सम्पत्ति का विवरण हलफनामे के माध्यम से प्रस्तुत नहीं करता तो अदालत उसके खिलाफ प्रतिकूल अनुमान (एडवर्स इंफेरेंस) लगा सकती है।


जस्टिस गरिमा प्रसाद की एकल पीठ पति द्वारा दाखिल उस आपराधिक पुनरीक्षण याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें फैमिली कोर्ट द्वारा पत्नी को अंतरिम भरण-पोषण दिए जाने के आदेश को चुनौती दी गई थी।


मामले के अनुसार पत्नी ने दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 125 के तहत भरण- पोषण की अर्जी दाखिल की थी। उसने बताया कि विवाह 14 जून 2020 को हुआ था, लेकिन 14 मार्च, 2022 से दोनों अलग रह रहे हैं। पत्नी का आरोप था कि दहेज की मांग को लेकर उसे ससुराल से निकाल दिया गया और उसके बाद से उसे कोई आर्थिक सहायता नहीं दी गई।


उसने प्रति माह 15,000 रुपये भरण-पोषण की मांग की थी यह कहते हुए कि उसे अपनी पढ़ाई, दैनिक खर्च और मेडिकल जरूरतों के लिए धन की आवश्यकता है। पत्नी ने दावा किया कि पति के पास 75 बीघा कृषि भूमि है, वह ठेके पर खेती करता है। प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए कोचिंग चलाता है और लगभग 40,000 रुपये प्रतिमाह की आय अर्जित करता है। वहीं पति ने इन सभी दावों से इनकार करते हुए कहा कि उसके पास कोई आय का स्रोत नहीं है। राजस्व अभिलेखों में उसके नाम कोई भूमि दर्ज नहीं है और वह कोई कोचिंग भी नहीं चलाता।

पति की ओर से यह भी तर्क दिया गया कि पत्नी उच्च शिक्षित है। उसने वर्ष 2011 में एमए और वर्ष 2024 में एलएलबी की पढ़ाई पूरी कर ली है। इसलिए वह स्वयं अपना भरण-पोषण करने में सक्षम है। ऐसे में फैमिली कोर्ट द्वारा 3,500 रुपये प्रति माह अंतरिम भरण-पोषण का आदेश मनमाना और अवैध बताया गया। हाइकोर्ट ने पाया कि पति को कई अवसर दिए जाने के बावजूद उसने फैमिली कोर्ट के समक्ष अपनी आय और सम्पत्ति का हलफनामा दाखिल नहीं किया। ऐसे मामलों में पति द्वारा आय छिपाने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता और उसके विरुद्ध प्रतिकूल अनुमान लगाया जा सकता है।

इस संदर्भ में कोर्ट ने सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश 19 नियम 3 और भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 106 (अब भारतीय साक्ष्य संहिता की धारा 109) का उल्लेख किया। कोर्ट ने कहा कि अंतरिम भरण-पोषण के स्तर पर सटीक गणना आवश्यक नहीं होती बल्कि पत्नी के अधिकार और आवश्यकता को ध्यान में रखकर आदेश पारित किया जाता है। पीठ ने यह भी कहा कि पति यह साबित करने में असफल रहा कि पत्नी की कोई स्वतंत्र आय है या वह किसी लाभकारी कार्य में संलग्न है। ऐसी परिस्थितियों में, एडिशनल प्रिंसिपल जज, फैमिली कोर्ट, पीलीभीत द्वारा दिया गया 3,500 रुपये प्रति माह का अंतरिम भरण-पोषण न तो अत्यधिक है और न ही मनमाना बल्कि न्यायोचित है। इसके साथ ही हाइकोर्ट ने पति की पुनरीक्षण याचिका खारिज कर दी।




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