30 Jun 2026
दधिबल यादव
1 जुलाई से देश में ग्रामीण रोजगार व्यवस्था एक नए दौर में प्रवेश करने जा रही है। लगभग दो दशकों तक ग्रामीण भारत की आजीविका का आधार रहे मनरेगा का स्थान अब वीबी-जी रामजी (विकसित भारत–गारंटी फॉर रोजगार एंड आजीविका मिशन–ग्रामीण) लेने जा रहा है। नई व्यवस्था के तहत प्रत्येक पात्र ग्रामीण परिवार को 100 दिनों के स्थान पर 125 दिनों के रोजगार की वैधानिक गारंटी दी जाएगी। साथ ही डिजिटल निगरानी, आजीविका आधारित परिसंपत्तियों के निर्माण और राज्यों की अधिक भागीदारी जैसे प्रावधान भी जोड़े गए हैं।
लेकिन सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि जब महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) पहले से मौजूद था, तब उसे बदलने की आवश्यकता क्यों महसूस हुई? क्या यह केवल नाम परिवर्तन है या ग्रामीण रोजगार नीति में वास्तविक सुधार का प्रयास? इन सवालों के उत्तर ही इस नई व्यवस्था के गुण-दोष तय करेंगे। मनरेगा वर्ष 2005 में उस समय शुरू किया गया था जब ग्रामीण भारत में बेरोजगारी, पलायन और कृषि संकट गहरा रहा था। इस योजना ने करोड़ों ग्रामीण परिवारों को न्यूनतम आय का सुरक्षा कवच प्रदान किया। विशेष रूप से कोविड-19 महामारी के दौरान जब शहरों से लाखों प्रवासी मजदूर गांव लौटे, तब मनरेगा ने उन्हें तत्काल रोजगार देकर सामाजिक सुरक्षा की महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यही कारण है कि इसे विश्व की सबसे बड़ी रोजगार गारंटी योजनाओं में गिना जाता है।
फिर भी समय के साथ मनरेगा पर अनेक सवाल उठे। कई राज्यों में फर्जी जॉब कार्ड, अपूर्ण कार्य, भुगतान में लंबी देरी, राजनीतिक हस्तक्षेप तथा परिसंपत्तियों की गुणवत्ता को लेकर लगातार आलोचना होती रही। सरकार का तर्क है कि नई योजना इन्हीं कमियों को दूर करने का प्रयास है। वीबी-जी रामजी में डिजिटल जॉब कार्ड, कार्यों की तकनीकी निगरानी, परिणाम आधारित परियोजनाओं और आजीविका से जुड़े स्थायी परिसंपत्ति निर्माण पर अधिक जोर दिया गया है। रोजगार के दिनों को 100 से बढ़ाकर 125 करना भी ग्रामीण परिवारों के लिए एक अतिरिक्त सुरक्षा माना जा रहा है।
नई योजना का एक सकारात्मक पक्ष यह भी है कि इसे केवल मजदूरी कार्यक्रम के रूप में नहीं, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने वाले मिशन के रूप में प्रस्तुत किया गया है। यदि रोजगार के साथ जल संरक्षण, सिंचाई, ग्रामीण सड़क, कृषि अवसंरचना, पशुपालन और स्थानीय उद्यमों का बेहतर समन्वय होता है तो इससे गांवों में स्थायी आर्थिक गतिविधियां विकसित हो सकती हैं। इससे पलायन कम करने और स्थानीय रोजगार बढ़ाने की संभावना भी बनेगी। लेकिन तस्वीर का दूसरा पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
सबसे बड़ी आलोचना वित्तीय ढांचे को लेकर हो रही है। मनरेगा में मजदूरी का अधिकांश भार केंद्र सरकार उठाती थी, जबकि नई योजना में कई राज्यों के लिए व्यय साझेदारी 60:40 कर दी गई है। आर्थिक रूप से कमजोर राज्यों के लिए यह अतिरिक्त बोझ साबित हो सकता है। यदि राज्य समय पर अपना हिस्सा उपलब्ध नहीं करा पाए, तो रोजगार और भुगतान दोनों प्रभावित होने की आशंका रहेगी।
दूसरी चिंता रोजगार की निरंतरता को लेकर है। नई व्यवस्था में कृषि के चरम मौसम के दौरान रोजगार गारंटी पर विराम जैसे प्रावधानों को लेकर विपक्ष और श्रमिक संगठनों ने सवाल उठाए हैं। उनका तर्क है कि ग्रामीण गरीब के लिए रोजगार की जरूरत मौसम देखकर नहीं आती। यदि काम की उपलब्धता प्रशासनिक निर्णयों पर निर्भर होगी तो कानूनी गारंटी का उद्देश्य कमजोर पड़ सकता है।
तीसरा प्रश्न डिजिटल व्यवस्था का है। पारदर्शिता के लिए तकनीक आवश्यक है, लेकिन देश के अनेक ग्रामीण क्षेत्रों में इंटरनेट, तकनीकी दक्षता और डिजिटल साक्षरता अभी भी सीमित है। यदि पूरी व्यवस्था तकनीक आधारित होगी तो सबसे कमजोर वर्गों के सामने नई बाधाएं भी खड़ी हो सकती हैं।
राजनीतिक स्तर पर भी यह बदलाव बहस का विषय बना हुआ है। समर्थकों का कहना है कि बदलते समय के अनुरूप योजनाओं में सुधार होना स्वाभाविक है और यदि नई व्यवस्था अधिक प्रभावी साबित होती है तो इसका स्वागत होना चाहिए। वहीं आलोचकों का आरोप है कि मनरेगा जैसी स्थापित योजना को समाप्त करने के बजाय उसमें सुधार करना अधिक व्यावहारिक विकल्प था। उनका मानना है कि योजना की कमियां प्रशासनिक थीं, न कि उसके मूल ढांचे की।
वास्तव में किसी भी रोजगार गारंटी योजना की सफलता केवल कानून बदलने से तय नहीं होती। उसकी सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि मजदूरी समय पर मिले, काम स्थानीय जरूरतों के अनुरूप हो, भ्रष्टाचार पर प्रभावी नियंत्रण हो और श्रमिकों को बिना भेदभाव के रोजगार उपलब्ध कराया जाए। यदि नई योजना इन मानकों पर बेहतर प्रदर्शन करती है तो यह ग्रामीण विकास की दिशा में महत्वपूर्ण कदम सिद्ध हो सकती है। लेकिन यदि केवल नाम और ढांचा बदले तथा पुरानी समस्याएं बनी रहीं, तो यह बदलाव अपेक्षित परिणाम नहीं दे पाएगा।
अंततः यह कहना उचित होगा कि वीबी-जी रामजी, मनरेगा का केवल उत्तराधिकारी नहीं, बल्कि उसकी अग्निपरीक्षा भी है। सरकार के सामने चुनौती है कि वह यह सिद्ध करे कि नया मॉडल वास्तव में अधिक प्रभावी, पारदर्शी और श्रमिक हितैषी है। वहीं विपक्ष और नागरिक समाज की जिम्मेदारी होगी कि वे रचनात्मक निगरानी करें। ग्रामीण भारत को किसी राजनीतिक प्रतीक की नहीं, बल्कि भरोसेमंद रोजगार सुरक्षा की आवश्यकता है। यदि नई व्यवस्था इस कसौटी पर खरी उतरती है, तभी यह बदलाव इतिहास में सुधार के रूप में दर्ज होगा, अन्यथा यह केवल एक और प्रशासनिक प्रयोग बनकर रह जाएगा।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)