25 Jun 2026
दधिबल यादव
25 जून 1975 की रात भारतीय लोकतंत्र के इतिहास की सबसे लंबी और सबसे बेचैन रातों में दर्ज है। आधी रात के बाद देश पर आपातकाल थोप दिया गया। संविधान के अनुच्छेद 352 का सहारा लेकर तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने लोकतंत्र को औपचारिक रूप से जीवित रखते हुए उसकी आत्मा को लगभग कैद कर दिया। प्रेस पर सेंसरशिप लगी। विपक्षी नेताओं को जेलों में डाल दिया गया। नागरिक स्वतंत्रताएं निलंबित कर दी गईं और असहमति को राष्ट्र-विरोध का पर्याय बना दिया गया।
आज, जब उस घटना के 50 वर्ष पूरे हो रहे हैं, तब सवाल केवल इतिहास को याद करने का नहीं है। सवाल यह भी है कि क्या हम उस इतिहास से कुछ सीख पाए हैं, या केवल उसकी राजनीतिक नीलामी करते रहे हैं?
दरअसल, आपातकाल किसी विदेशी आक्रमण या राष्ट्रीय आपदा की प्रतिक्रिया नहीं था। उसका वास्तविक कारण सत्ता का संकट था। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने इंदिरा गांधी के चुनाव को अवैध ठहराया था। विपक्ष सड़कों पर था। छात्र आंदोलन उफान पर था। जय प्रकाश नारायण के नेतृत्व में व्यवस्था परिवर्तन की मांग उठ रही थी। लोकतंत्र में ऐसी परिस्थितियों का उत्तर जनता के बीच जाकर राजनीतिक संघर्ष करना होता है। लेकिन सत्ता ने संघर्ष के बजाय नियंत्रण चुना। नतीजतन, लोकतंत्र को ही संदेह की निगाह से देखा जाने लगा। सत्ता को लगा कि जनता से अधिक बुद्धिमान वही है, इसलिए जनता के अधिकार कुछ समय के लिए स्थगित किए जा सकते हैं। इतिहास का सबसे बड़ा व्यंग्य यही है कि लोकतंत्र को बचाने के नाम पर लोकतंत्र को ही बंधक बना लिया गया।
आपातकाल का सबसे भयावह पहलू प्रेस की स्वतंत्रता पर हमला था। अखबारों के संपादकीय पहले सरकारी सेंसर के पास जाते थे। कुछ अखबार झुक गए, कुछ घुटनों के बल चलने लगे और कुछ ने प्रतिरोध का जोखिम उठाया। कहा जाता है कि उस दौर में पत्रकारों से केवल झुकने को कहा गया था लेकिन अनेक लोग रेंगने लगे। यह टिप्पणी आज भी भारतीय पत्रकारिता के इतिहास पर एक स्थायी प्रश्नचिह्न की तरह मौजूद है। लोकतंत्र में प्रेस केवल सूचना का माध्यम नहीं, सत्ता की निगरानी का उपकरण भी होता है। जब सत्ता अखबारों को अपना जनसंपर्क विभाग समझने लगे, तब आपातकाल की मानसिकता जन्म लेती है, चाहे संवैधानिक आपातकाल घोषित हुआ हो या नहीं।
आपातकाल की पचासवीं वर्षगांठ पर राजनीतिक दल स्वाभाविक रूप से अपने-अपने चश्मे पहनकर इतिहास पढ़ रहे हैं। सत्ता पक्ष इसे कांग्रेस की तानाशाही का प्रमाण बताता है, जबकि विपक्ष वर्तमान समय में लोकतांत्रिक संस्थाओं पर बढ़ते दबाव की चर्चा करता है। निस्संदेह, आज का भारत 1975 का भारत नहीं है। आज चुनाव नियमित रूप से हो रहे हैं, विपक्ष अस्तित्व में है, न्यायपालिका काम कर रही है और सोशल मीडिया के कारण सूचना पर पूर्ण नियंत्रण लगभग असंभव है। इसलिए वर्तमान समय को शाब्दिक अर्थ में आपातकाल कहना इतिहास और राजनीति—दोनों के साथ अन्याय होगा। लेकिन यह भी उतना ही सच है कि लोकतंत्र केवल चुनाव का नाम नहीं है।
यदि जांच एजेंसियों की निष्पक्षता पर लगातार प्रश्न उठें, यदि संसद में बहस की जगह शोर और संख्या-बल ले ले, यदि मीडिया का बड़ा हिस्सा सत्ता से सवाल पूछने के बजाय विपक्ष की जिरह में व्यस्त दिखाई दे, यदि असहमति को राष्ट्रभक्ति की परीक्षा से गुजरना पड़े—तो लोकतंत्र की गुणवत्ता पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है। यहीं से "घोषित आपातकाल" और "मानसिक आपातकाल" के बीच की बहस शुरू होती है। भारतीय राजनीति की एक दिलचस्प विशेषता है—यह इतिहास को याद कम करती है, इस्तेमाल ज्यादा करती है।
जो दल आज आपातकाल को लोकतंत्र का सबसे बड़ा अपराध बताते हैं, वे भी कभी-कभी आलोचना को सहजता से स्वीकार करते नहीं दिखते। दूसरी ओर, जो दल आपातकाल की आलोचना से असहज होते हैं, वे यह स्वीकार करने में हिचकते हैं कि 1975 भारतीय लोकतंत्र की एक गंभीर ऐतिहासिक भूल थी। राजनीति में स्मृति अक्सर सिद्धांत से नहीं, सुविधा से संचालित होती है। आज यदि कोई दल आपातकाल की याद दिला रहा है, तो जनता को यह भी पूछना चाहिए कि वह वर्तमान में असहमति, प्रेस की स्वतंत्रता और संस्थागत स्वायत्तता के प्रति कितना प्रतिबद्ध है। और यदि कोई दल वर्तमान लोकतंत्र की दुहाई दे रहा है, तो उसे भी यह स्वीकार करना चाहिए कि लोकतंत्र का गला घोंटने का पाप उसके इतिहास में दर्ज है।
1977 में जब चुनाव हुए तो जनता ने इंदिरा गांधी को सत्ता से बाहर कर दिया। यही भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत थी। जनता ने साबित कर दिया कि लोकतंत्र की अंतिम संरक्षक कोई सरकार, कोई अदालत या कोई संविधान की धारा नहीं, बल्कि जागरूक नागरिक होता है। पचास साल बाद सबसे बड़ा सबक यही है कि लोकतंत्र अचानक नहीं मरता। वह धीरे-धीरे कमजोर होता है—जब नागरिक सवाल पूछना छोड़ देते हैं, जब मीडिया सत्ता से दूरी खो देता है, जब विपक्ष केवल विरोध और सत्ता केवल प्रचार में बदल जाती है, और जब जनता राजनीतिक निष्ठा को लोकतांत्रिक मूल्यों से ऊपर रख देती है।
आपातकाल का स्मरण केवल कांग्रेस की आलोचना या किसी एक नेता के मूल्यांकन तक सीमित नहीं होना चाहिए। वह भारतीय लोकतंत्र के लिए एक स्थायी चेतावनी है। 1975 हमें बताता है कि सत्ता चाहे किसी भी दल के हाथ में हो, उसका स्वभाव विस्तारवादी होता है। लोकतंत्र का काम उस विस्तार पर अंकुश लगाना है। इसलिए लोकतंत्र का सबसे बड़ा उत्सव चुनाव नहीं, बल्कि असहमति का सम्मान है। पचास वर्ष बाद भी आपातकाल का प्रश्न यही है—क्या हम केवल उस अंधेरे को याद कर रहे हैं, या यह भी सुनिश्चित कर रहे हैं कि किसी भी रंग, किसी भी झंडे और किसी भी नारे के नाम पर वह अंधेरा फिर कभी लौट न सके? क्योंकि लोकतंत्र की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि उसकी हत्या अक्सर लोकतंत्र की रक्षा के नाम पर ही की जाती है। और इतिहास गवाह है—सत्ता बदलती रहती है, लेकिन सत्ता का प्रलोभन नहीं।