30 Jul 2026
दधिबल यादव
मानसून भारत की जीवनरेखा है। देश की लगभग आधी कृषि वर्षा पर निर्भर है और करोड़ों लोगों की आजीविका मानसून से जुड़ी है। किंतु यही मानसून जब अपनी सामान्य लय से विचलित होता है तो जीवनदायी जल विनाश का कारण बन जाता है। इस वर्ष पूर्वोत्तर के राज्यों, विशेषकर असम, अरुणाचल प्रदेश और मणिपुर, के साथ बिहार, गुजरात, महाराष्ट्र, जम्मू एवं कश्मीर, उत्तराखंड तथा हिमाचल प्रदेश के अनेक हिस्सों में अतिवृष्टि और बाढ़ ने व्यापक तबाही मचाई है। लाखों लोग प्रभावित हैं, हजारों हेक्टेयर फसलें जलमग्न हैं, सड़कें और पुल क्षतिग्रस्त हुए हैं तथा सामान्य जनजीवन अस्त-व्यस्त हो गया है।
असम राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के अनुसार हालिया बाढ़ में 68 लोगों की मृत्यु हो चुकी है तथा लगभग साढ़े चार लाख लोग अब भी प्रभावित हैं। बिहार में कोसी, गंडक, बागमती और कमला जैसी नदियों का जलस्तर लगातार खतरे के निशान के आसपास बना हुआ है। गुजरात और महाराष्ट्र में भी कई जिलों में अत्यधिक वर्षा के कारण बाढ़ और जलभराव की स्थिति उत्पन्न हुई है। भारतीय मौसम विभाग का अनुमान है कि जलवायु परिवर्तन के कारण अत्यधिक वर्षा की घटनाएं भविष्य में और बढ़ सकती हैं।
इन आंकड़ों से कहीं अधिक महत्वपूर्ण वह प्रश्न है, जिसे हम हर वर्ष टाल देते हैं—क्या भारत में बाढ़ केवल प्राकृतिक आपदा है, या फिर यह हमारे विकास मॉडल, प्रशासनिक लापरवाही और पर्यावरणीय उपेक्षा का भी परिणाम है?
सच यह है कि भारत में बाढ़ की त्रासदी अब केवल नदियों तक सीमित नहीं रह गई है। महानगरों की सड़कें भी नदी बन जाती हैं और छोटे शहरों में कुछ घंटों की बारिश सामान्य जीवन ठप कर देती है। इसका सबसे बड़ा कारण अनियोजित शहरीकरण है। पिछले तीन दशकों में शहरों का विस्तार तो हुआ, लेकिन प्राकृतिक जल निकासी तंत्र सिकुड़ता गया। नाले पाटकर कॉलोनियां बस गईं, तालाबों पर व्यावसायिक परिसर खड़े हो गए और नदियों के बाढ़ क्षेत्र में बहुमंजिला इमारतें उग आईं। परिणामस्वरूप वर्षा का पानी अपने प्राकृतिक मार्ग से बहने के बजाय सड़कों और घरों में घुसने लगा।
नीति आयोग ने अपनी विभिन्न रिपोर्टों में स्पष्ट किया है कि भारत के अधिकांश शहरों में समेकित शहरी जल प्रबंधन का अभाव है। केंद्रीय जल आयोग भी वर्षों से नदी क्षेत्र प्रबंधन और बाढ़ मैदानों के वैज्ञानिक उपयोग की आवश्यकता पर बल देता रहा है। किंतु दुर्भाग्य यह है कि विकास योजनाओं में पर्यावरणीय चेतावनियां अक्सर औपचारिकता बनकर रह जाती हैं।
हिमालयी राज्यों की स्थिति और अधिक चिंताजनक है। वर्ष 2013 की उत्तराखंड आपदा ने दिखा दिया था कि अनियंत्रित निर्माण, नदी तटों पर अतिक्रमण और पर्वतीय क्षेत्रों में अवैज्ञानिक सड़क निर्माण किस प्रकार प्राकृतिक आपदा को महाविनाश में बदल सकता है। वर्ष 2018 की केरल बाढ़ और 2023 में हिमाचल प्रदेश में आई आपदा ने भी यही संदेश दोहराया कि प्रकृति के साथ संघर्ष का परिणाम अंततः मनुष्य को ही भुगतना पड़ता है।
प्रख्यात पर्यावरणविद् अनुपम मिश्र ने लिखा था—"जल को संकट नहीं बनाया गया, जल के साथ हमारा व्यवहार संकट बन गया है।" यह कथन आज पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक प्रतीत होता है।
बाढ़ का दूसरा पक्ष प्रशासनिक व्यवस्था से जुड़ा है। प्रत्येक वर्ष राहत और पुनर्वास के लिए हजारों करोड़ रुपये स्वीकृत होते हैं। राष्ट्रीय आपदा मोचन बल (एनडीआरएफ), राज्य आपदा बल, सेना और स्थानीय प्रशासन कठिन परिस्थितियों में सराहनीय कार्य भी करते हैं। अनेक अधिकारी और कर्मचारी अपने जीवन की परवाह किए बिना लोगों को सुरक्षित निकालते हैं। यह भी उतना ही सत्य है कि उनके प्रयासों के कारण असंख्य जानें बचती हैं।
लेकिन इस सकारात्मक पक्ष के साथ एक असुविधाजनक सच भी जुड़ा है। नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) की अनेक रिपोर्टों में समय-समय पर आपदा प्रबंधन कोष के उपयोग, तटबंधों के निर्माण, राहत सामग्री की खरीद और पुनर्वास योजनाओं में अनियमितताओं की ओर संकेत किया गया है। अनेक राज्यों में हर वर्ष वही तटबंध टूटते हैं, वही सड़कें बह जाती हैं और उन्हीं परियोजनाओं पर बार-बार खर्च होता है। इससे यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या हमारी प्राथमिकता स्थायी समाधान है या केवल आपदा के बाद राहत का प्रबंधन?
दरअसल भारत में आपदा प्रबंधन का ढांचा अभी भी "राहत-केंद्रित" अधिक है, जबकि आवश्यकता "जोखिम न्यूनीकरण" की है। विकसित देशों ने बाढ़ से लड़ने के लिए नदी क्षेत्र नियोजन, वर्षाजल प्रबंधन, कृत्रिम जलाशयों, प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली और समुदाय आधारित तैयारी पर दशकों तक निवेश किया है। भारत में भी राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (एनडीएमए) ने विस्तृत दिशानिर्देश जारी किए हैं, लेकिन उनका प्रभावी क्रियान्वयन अभी भी चुनौती बना हुआ है।
जलवायु परिवर्तन ने स्थिति को और जटिल बना दिया है। वैज्ञानिकों का निष्कर्ष है कि भारतीय मानसून की प्रकृति बदल रही है। अब कम दिनों में अत्यधिक वर्षा की घटनाएं बढ़ रही हैं। जब कुछ घंटों में पूरे महीने जितनी वर्षा हो जाए, तब कमजोर जल निकासी व्यवस्था और अवैज्ञानिक निर्माण बाढ़ को कई गुना विनाशकारी बना देते हैं। इसलिए जलवायु परिवर्तन को भविष्य की समस्या मानने की भूल अब नहीं की जा सकती।
महात्मा गांधी ने कहा था—"प्रकृति प्रत्येक मनुष्य की आवश्यकता पूरी कर सकती है, लेकिन किसी एक के लालच को नहीं।" यह कथन आज के विकास मॉडल पर भी लागू होता है। यदि नदियों के बाढ़ क्षेत्र पर कब्जा होगा, आर्द्रभूमियां नष्ट होंगी, जंगल कटेंगे और हरित क्षेत्र सिकुड़ेंगे, तो प्रकृति अंततः अपना स्थान स्वयं वापस लेगी।
समाधान भी स्पष्ट हैं। प्रत्येक शहर के लिए वैज्ञानिक ड्रेनेज मास्टर प्लान अनिवार्य हो। नदियों के बाढ़ क्षेत्र का सीमांकन कर वहां स्थायी निर्माण पर कठोर प्रतिबंध लगाया जाए। तालाबों, झीलों और आर्द्रभूमियों का पुनर्जीवन राष्ट्रीय अभियान बनाया जाए। तटबंधों के निर्माण और मरम्मत की थर्ड-पार्टी तकनीकी जांच हो। राहत वितरण पूरी तरह डिजिटल और पारदर्शी बनाया जाए। बाढ़ के बाद पुनर्निर्माण से अधिक महत्व बाढ़ से पहले की तैयारी को दिया जाए। विद्यालयों से लेकर पंचायतों तक सामुदायिक आपदा प्रबंधन का प्रशिक्षण नियमित रूप से संचालित हो।
भारत को यह स्वीकार करना होगा कि बाढ़ का समाधान केवल राहत पैकेजों और मुआवजों में नहीं है। जब तक विकास योजनाओं में पर्यावरण, नदी और जल निकासी तंत्र को आर्थिक विकास जितना ही महत्व नहीं मिलेगा, तब तक मानसून हर वर्ष हमारी नीतिगत कमियों का आईना दिखाता रहेगा।
बाढ़ प्रकृति का प्रकोप अवश्य है, किंतु उसका विनाशकारी स्वरूप बहुत हद तक मानवीय भूलों का परिणाम बन चुका है। यदि हम इस चेतावनी को अभी भी नहीं समझेंगे, तो हर वर्ष समाचार बदलेंगे, पीड़ित बदलेंगे, सरकारें बदलेंगी, लेकिन त्रासदी का दृश्य वही रहेगा। किसी राष्ट्र की परिपक्वता इस बात से नहीं मापी जाती कि वह आपदा के बाद कितनी राहत बांटता है; बल्कि इससे मापी जाती है कि वह दूरदर्शी नीति, वैज्ञानिक नियोजन और पारदर्शी प्रशासन के माध्यम से आपदाओं को कितनी हद तक त्रासदी बनने से रोक पाता है। यही भारत के सामने आज की सबसे बड़ी चुनौती है, और यही सबसे बड़ी आवश्यकता भी।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)