07 Mar 2026
-आंसर बुक की सर्टिफाइड कॉपी देने पर वसूले जा रहे थे एक हजार रुपये जोधपुर, 07 मार्च (हि.स.)। राजस्थान हाईकोर्ट ने राजस्थान स्वास्थ्य विज्ञान विश्वविद्यालय (आरयूएचएस) जयपुर द्वारा आरटीआई के तहत आंसर बुक की सर्टिफाइड कॉपी देने पर वसूले जा रहे एक हजार रुपये के प्रोसेसिंग शुल्क को अवैध घोषित कर रद्द कर दिया। जस्टिस डॉ. पुष्पेंद्र सिंह भाटी और जस्टिस संदीप शाह की खंडपीठ ने 2021 में दायर एक याचिका पर सुनवाई करते हुए यह रिपोर्टेबल जजमेंट दिया। मामले के अनुसार जोधपुर के विष्णु नगर निवासी याचिकाकर्ता विपिका पुत्री सुभाष गहलोत बीएससी नर्सिंग कोर्स के अंतिम वर्ष में मिडवाइफरी ऑब्स्टेट्रिकल नर्सिंग और कम्युनिटी हेल्थ नर्सिंग द्वितीय विषयों में फेल हो गई थी। रिजल्ट के बाद याचिकाकर्ता ने आरटीआई कानून के तहत अपनी आंसर बुक्स की कॉपी के लिए आवेदन कर निर्धारित शुल्क जमा करवाया। इसके जवाब में विश्वविद्यालय ने 2 फरवरी 2021 को पत्र भेजकर याचिकाकर्ता से प्रति आंसर बुक 1000 रुपये प्रोसेसिंग फीस, 80 रुपये पेज शुल्क (दो रुपए प्रति पेज के हिसाब से 40 पेज) और 145 रुपये डाक शुल्क सहित कुल 1225 रुपये की मांग की, जिसे हाईकोर्ट में चुनौती दी गई। याचिकाकर्ता की ओर से वकील रज्जाक खान और सरवर खान ने तर्क दिया कि 1000 रुपये की फीस वसूलना आरटीआई कानून और 2005 के फीस नियमों का खुला उल्लंघन है। नियम 3 के मुताबिक, आवेदन शुल्क सिर्फ दस रुपए है। इतनी ज्यादा फीस से विश्वविद्यालय आरटीआई को ही बेकार बनाने की कोशिश कर रहा है। विश्वविद्यालय की ओर से वकील ने आरटीआई की धारा 7 का हवाला देकर कहा कि वे सूचना देने की लागत वसूल सकते हैं। यह शुल्क 1 दिसंबर 2014 की मैनेजमेंट बोर्ड बैठक में तय किया गया था। विवि में 6.50 लाख आंसर बुक्स रखी जाती हैं, जिन्हें संभालने के लिए तीन संविदा कर्मचारियों का सालाना वेतन 3.60 लाख रुपये है। हर साल 350 आवेदनों से हिसाब लगाकर प्रति आवेदन 1028 रुपये की लागत आती है। राज्य सरकार के 2018 के परिपत्र के तहत विशेष नियमों से अलग शुल्क लगाया जा सकता है। कोर्ट ने फैसले में साफ कहा कि आरटीआई की धारा 22 इसे किसी भी अन्य कानून या नियम से ऊपर रखती है। जब आवेदन आरटीआई के तहत है, तो विश्वविद्यालय के अपने नियम इसे ओवरराइड नहीं कर सकते। 2012 के नियमों के मुताबिक, ए-3 या छोटे साइज के पेपर की फोटोकॉपी के लिए अधिकतम 2 रुपये प्रति पेज ही लिया जा सकता है। कोर्ट ने अपने फैसले में लिखा कि विश्वविद्यालय द्वारा एक हजार रुपए प्रोसेसिंग शुल्क वसूलना न्यायोचित नहीं है। कोर्ट ने निर्देश दिया कि 6 सितंबर 2012 के दिशा-निर्देशों और 20 दिसंबर 2014 के मैनेजमेंट बोर्ड के फैसले को प्रति आवेदन 1000 रुपए प्रोसेसिंग फीस वसूलने की सीमा तक रद्द किया जाता है। कोर्ट ने निर्देश दिया कि विश्वविद्यालय अब आरटीआई नियम 2012 में निर्धारित शुल्क वसूलने के बाद ही छात्रों को जानकारी प्रदान करे।