08 Mar 2026
वाराणसी, 8 मार्च (इंद्रप्रस्थ न्यूज)। वाराणसी के अस्सी घाट से संचालित ‘सुबाह-ए-बनारस’ पहल के तहत काशी की प्राचीन आध्यात्मिक परंपराओं और सांस्कृतिक विरासत को विश्वभर तक पहुंचाने की दिशा में एक नई पहल शुरू की गई है। ‘डिवाइन नेक्टर’ आध्यात्मिक पहल के तहत हाल ही में अस्सी घाट पर एक संकल्प लिया गया, जिसके माध्यम से काशी से जुड़ी परंपराओं और अनुष्ठानों को दुनिया के लोगों तक डिजिटल माध्यम से पहुंचाने की संभावना पर काम किया जा रहा है।
इस प्रयास के तहत ‘आकाशावर्स’ के अंतर्गत विकसित किए जा रहे डिजिटल प्लेटफॉर्म ‘आकाशा दर्शन’ को तकनीकी सहयोग मंच के रूप में जोड़ा गया है। इस प्लेटफॉर्म का उद्देश्य भारत के विभिन्न पवित्र स्थलों से जुड़े आध्यात्मिक और सांस्कृतिक अनुभवों को डिजिटल माध्यम से लोगों तक पहुंचाना है, ताकि दुनिया के किसी भी हिस्से में बैठे लोग इन परंपराओं से जुड़ सकें।
प्लेटफॉर्म के शुरुआती चरण में श्रद्धालु अपने नाम से कुछ विशेष अनुष्ठानों के आयोजन का अनुरोध कर सकेंगे, जिनका प्रमाणित वीडियो दस्तावेज़ उन्हें उपलब्ध कराया जाएगा। साथ ही जहां संभव होगा, संबंधित धार्मिक प्रसाद या पूजन सामग्री भी उन्हें भेजी जा सकेगी। इस पहल में सुबाह-ए-बनारस के संस्थापक डॉ. रत्नेश वर्मा की परिकल्पना से प्रेरणा ली गई है, जो लंबे समय से काशी के घाटों से जुड़ी आध्यात्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं के संरक्षण और प्रसार के लिए कार्य कर रहे हैं।
तकनीकी पक्ष से इस पहल को आकाशावर्स के ग्लोबल सीईओ संज़ीव मेहता का समर्थन मिल रहा है, जिन्हें वैश्विक बैंकिंग, डिजिटल इकोसिस्टम और रणनीतिक साझेदारियों में 25 वर्षों से अधिक का अनुभव है। कार्यक्रम के संचालन और समन्वय के लिए मेरीएमी टेक्नोलॉजीज प्राइवेट लिमिटेड को स्वतंत्र फुलफिलमेंट और कोऑर्डिनेशन पार्टनर के रूप में जोड़ा गया है, जिसका नेतृत्व चीफ बिजनेस ऑफिसर (ग्लोबल हेड–स्ट्रेटेजी एंड पार्टनरशिप) विकास मल्होत्रा कर रहे हैं।
इस संबंध में मेरीएमी टेक्नोलॉजीज ने सुबाह-ए-बनारस से जुड़ी संस्था आश्रय सेवा संस्थान के साथ औपचारिक समझौता किया है, जिसका प्रतिनिधित्व डॉ. वीरेन्द्र प्रताप सिंह कर रहे हैं। इस सहयोग के तहत सुबाह-ए-बनारस कार्यक्रम से जुड़े पारंपरिक अनुष्ठान—जैसे गंगा आरती, यज्ञ, जल अर्पण और दीप अर्पण—को डिजिटल माध्यम से वैश्विक प्रतिभागियों तक पहुंचाने की दिशा में काम किया जाएगा। पहल का उद्देश्य काशी की सदियों पुरानी आध्यात्मिक और सांस्कृतिक विरासत को जिम्मेदारी के साथ दुनिया के सामने प्रस्तुत करना है।