15 Sep 2026
लोकतंत्र की सबसे खूबसूरत तस्वीर संसद की नहीं, उस आम नागरिक की उंगली पर लगी स्याही में दिखाई देती है, जो इस विश्वास से मतदान करने जाता है कि उसका एक वोट देश की दिशा बदल सकता है। लेकिन सवाल यह है, क्या उस एक दिन का वोट ही लोकतंत्र है?
हर साल 15 सितंबर को अंतरराष्ट्रीय लोकतंत्र दिवस मनाया जाता है। यह दिन हमें सिर्फ लोकतंत्र की उपलब्धियों को याद करने का नहीं, बल्कि यह पूछने का अवसर देता है कि लोकतंत्र वास्तव में कितना मजबूत है।
दुनिया में लोकतंत्र एक चुनौतीपूर्ण दौर से गुजर रहा है। International IDEA की Global State of Democracy 2025 रिपोर्ट के अनुसार, 2024 में आकलन किए गए 94 देशों यानि 54 प्रतिशत देशों में पिछले पांच वर्षों की तुलना में लोकतांत्रिक प्रदर्शन के कम-से-कम एक क्षेत्र में गिरावट आई। चुनाव हो रहे हैं, लेकिन चुनावी प्रक्रियाओं की विश्वसनीयता, संस्थाओं की स्वतंत्रता और नागरिक अधिकारों को लेकर चिंता बढ़ी है।
2020 से 2024 के बीच लगभग हर पांच में से एक चुनाव को कानूनी चुनौती मिली और लगभग इतने ही चुनावों में हारने वाले उम्मीदवार या दल ने परिणाम स्वीकार करने से इनकार किया। यह सिर्फ राजनीतिक असहमति का संकेत नहीं है। यह लोकतंत्र की सबसे जरूरी पूंजी विश्वास की परीक्षा है।
भारत के संदर्भ में यह चर्चा और महत्वपूर्ण हो जाती है। दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र होने के नाते भारत ने विशाल सामाजिक और सांस्कृतिक विविधता के बीच लोकतांत्रिक व्यवस्था को कायम रखा है। करोड़ों मतदाताओं की भागीदारी हमारी सबसे बड़ी ताकत है।
लेकिन लोकतंत्र की गुणवत्ता केवल मतदाताओं की संख्या से नहीं मापी जाती। International IDEA के 2025 आकलन में भारत को Representation के मामले में 173 देशों में 77वां और Rights के मामले में 108वां स्थान मिला। रिपोर्ट ने पिछले पांच वर्षों में भारत में न्याय तक पहुंच, नागरिक भागीदारी, विश्वसनीय चुनाव, राजनीतिक दलों की स्वतंत्रता और न्यायिक स्वतंत्रता जैसे कुछ क्षेत्रों में गिरावट भी दर्ज की।
इन आंकड़ों को किसी एक के पक्ष या विपक्ष में अंतिम फैसला मानने के बजाय लोकतंत्र के लिए एक सतर्क संकेत की तरह देखना चाहिए। क्योंकि लोकतंत्र की असली परीक्षा मतदान केंद्र के बाहर भी होती है, जब कोई नागरिक सवाल पूछता है, जब मीडिया सत्ता से जवाब मांगता है, जब कोई व्यक्ति बहुमत से अलग राय रखता है और जब समाज असहमति को दुश्मनी नहीं समझता।
सोशल मीडिया और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस ने नागरिकों की आवाज को अभूतपूर्व शक्ति दी है, लेकिन फेक न्यूज, डीपफेक और दुष्प्रचार ने सत्य की पहचान को भी कठिन बनाया है। ऐसे समय में सूचित नागरिकता लोकतंत्र की नई जरूरत है। लोकतंत्र का अर्थ यह नहीं है कि हम सभी एक जैसे सोचें। इसका अर्थ है कि हम अलग सोचते हुए भी एक-दूसरे की आवाज सुन सकें।
लोकतंत्र कोई ऐसी व्यवस्था नहीं है जिसे एक बार हासिल करके हमेशा के लिए सुरक्षित कर लिया जाए। इसे हर पीढ़ी को अपने सवालों, अपनी भागीदारी और अपने व्यवहार से मजबूत करना पड़ता है।
इस अंतरराष्ट्रीय लोकतंत्र दिवस पर शायद सबसे जरूरी संकल्प यही हो- लोकतंत्र को सिर्फ वोट देने का अधिकार नहीं, बल्कि हर दिन निभाई जाने वाली जिम्मेदारी समझें।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)