15 Jun 2026
-क्या महंगाई की दूसरी लहर दस्तक दे रही है?
नई दिल्ली, 15 जून (इंद्रप्रस्थ न्यूज)। थोक महंगाई (WPI) के ताजा आंकड़ों ने सरकार और भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) दोनों के लिए चिंता बढ़ा दी है। मई 2026 में थोक मूल्य सूचकांक आधारित महंगाई दर बढ़कर 9.68 प्रतिशत पर पहुंच गई, जो नवंबर 2022 के बाद का सबसे ऊंचा स्तर है। अप्रैल में यह दर 8.30 प्रतिशत थी। आंकड़े बाजार के अनुमान से भी अधिक रहे, जिससे संकेत मिल रहा है कि उत्पादन और आपूर्ति श्रृंखला पर लागत का दबाव लगातार बढ़ रहा है।
हालांकि सरकार इसे वैश्विक परिस्थितियों और ऊर्जा कीमतों के दबाव का परिणाम बता सकती है, लेकिन बड़ा सवाल यह है कि जब खुदरा महंगाई (CPI) अभी भी RBI के 4 प्रतिशत लक्ष्य के आसपास है, तब थोक स्तर पर कीमतों में इतनी तेज वृद्धि आखिर किस ओर इशारा कर रही है?
-ऊर्जा संकट ने बढ़ाया दबाव
विश्लेषकों का मानना है कि पश्चिम एशिया में जारी तनाव और कच्चे तेल की कीमतों में तेजी ने भारतीय अर्थव्यवस्था पर सीधा असर डाला है। अप्रैल से ही ईंधन और ऊर्जा श्रेणी में तेज वृद्धि देखी जा रही थी, जिसने मई में और गति पकड़ी। इसके अलावा धातु, रसायन और विनिर्माण क्षेत्र में लागत बढ़ने से थोक महंगाई लगातार ऊपर जा रही है।
यह स्थिति इसलिए भी चिंताजनक है क्योंकि थोक महंगाई को अक्सर खुदरा महंगाई का अग्रिम संकेतक माना जाता है। यानी आज फैक्ट्रियों और कारोबारियों की लागत बढ़ रही है तो आने वाले महीनों में उसका बोझ उपभोक्ताओं की जेब पर भी पड़ सकता है।
-क्या सरकार के महंगाई नियंत्रण के दावे कमजोर पड़ रहे हैं?
पिछले एक साल से सरकार यह दावा करती रही है कि महंगाई नियंत्रण में है और भारत दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है। लेकिन WPI के ताजा आंकड़े बताते हैं कि अर्थव्यवस्था के उत्पादन पक्ष में लागत का दबाव तेजी से बढ़ रहा है।
दिलचस्प यह भी है कि मई में खुदरा महंगाई 3.93 प्रतिशत रही, जो RBI के लक्ष्य से थोड़ा नीचे है, जबकि थोक महंगाई लगभग 10 प्रतिशत तक पहुंच गई। यह अंतर बताता है कि अभी तक कंपनियां पूरी लागत उपभोक्ताओं पर नहीं डाल रही हैं। लेकिन यह स्थिति लंबे समय तक बनी रहे, इसकी संभावना कम दिखती है।
-नए WPI और PPI की शुरुआत के बीच आया बड़ा झटका
आज जारी आंकड़ों की एक और अहमियत है। सरकार ने इसी महीने संशोधित WPI श्रृंखला और नए Producer Price Index (PPI) की शुरुआत की है, जिसका आधार वर्ष 2022-23 रखा गया है। सरकार का दावा है कि इससे महंगाई की तस्वीर अधिक वास्तविक और व्यापक रूप से सामने आएगी। लेकिन आलोचकों का कहना है कि नई श्रृंखला के पहले ही महीने में इतनी ऊंची महंगाई सामने आना इस बात का संकेत है कि अर्थव्यवस्था में लागत आधारित दबाव पहले से अधिक गहरा है। ऐसे में केवल सांख्यिकीय बदलावों से वास्तविक आर्थिक चुनौतियां नहीं छिपाई जा सकतीं।
-RBI के लिए बढ़ सकती है मुश्किल
RBI ने हाल के महीनों में ब्याज दरों को लेकर अपेक्षाकृत नरम रुख अपनाया था क्योंकि खुदरा महंगाई नियंत्रण में दिखाई दे रही थी। लेकिन यदि थोक महंगाई का यह दबाव अगले कुछ महीनों में खुदरा स्तर तक पहुंचता है, तो केंद्रीय बैंक के सामने विकास और महंगाई के बीच संतुलन साधने की चुनौती और कठिन हो जाएगी।
दरअसल, मई का WPI आंकड़ा केवल एक सांख्यिकीय सूचना नहीं है, बल्कि यह अर्थव्यवस्था के भीतर बढ़ती लागत, वैश्विक ऊर्जा संकट और संभावित उपभोक्ता महंगाई का शुरुआती संकेत है। सरकार फिलहाल खुदरा महंगाई के अपेक्षाकृत नियंत्रित रहने का हवाला दे सकती है, लेकिन यदि थोक स्तर पर कीमतों की यह आग बाजार तक पहुंची, तो आने वाले महीनों में महंगाई एक बार फिर बड़ा राजनीतिक और आर्थिक मुद्दा बन सकती है।