20 Aug 2026
नई दिल्ली, 20 अगस्त (एजेंसी)। उच्चतम न्यायालय ने एक अहम फैसला सुनाते हुए कहा है कि पुलिस आम तौर पर भ्रूण लिंग का पता लगाने से जुड़े अपराधों की जांच और एफआईआर दर्ज नहीं कर सकती है। जस्टिस संजय करोल की अध्ययक्षता वाली बेंच ने कहा कि इस कानून के तहत तय किए गए अधिकारियों को ही ऐसे मामलों में मुख्य भूमिका निभानी चाहिए।
कोर्ट ने कहा कि इस कानून के तहत पुलिस जांचकर्ता की भूमिका नहीं निभा सकती है। हालांकि, उपयुक्त प्राधिकारी की जरूरत होने पर पुलिस सीमित और सहायक भूमिका निभा सकती है। उच्चतम न्यायालय ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के उस फैसले से सहमति जताई, जिसमें कहा गया था कि पीसीपीएनडीटी एक्ट के उल्लंघन के मामलों में पुलिस न तो जांच कर सकती है और न ही एफआईआर दर्ज कर सकती है। कोर्ट ने कहा कि इस कानून से जुड़े मामले तकनीकी प्रकृति के होते हैं, जिनमें चिकित्सकीय जानकारी और संवेदनशीलता की जरुरत होती है। इसलिए कानून के तहत पुलिस को प्राथमिक जांच एजेंसी नहीं बनाया गया है।
मामला उत्तर प्रदेश के एक डॉक्टर से जुड़ा था, जिसके खिलाफ 2017 में पुलिस ने पीसीपीएनटीडी एक्ट के तहत एफआईआर दर्ज की थी। डॉक्टर पर आरोप था कि वह अवैध रूप से भ्रूण का लिंग पता कराकर दंपतियों को कन्या भ्रूण को जन्म लेने से रोकने में मदद कर रहा था। डॉक्टर ने उच्च न्यायालय में मामला रद्द करने की मांग करते हुए दलील दी थी कि इस कानून के तहत एफआईआर दर्ज नहीं की जा सकती, क्योंकि धारा 28 के तहत शिकायत दर्ज कराने का अधिकार उचित प्राधिकरण या अधिकृत व्यक्ति को है। उसका कहना था कि उसके मामले में एफआईआर तहसीलदार की ओर से दर्ज की गई थी, जिसे उचित प्राधिकरण नहीं माना जा सकता।